" सीताराम विला" रंग-बिरंगी रोशनी में नहा रहा था। बाहर "सुस्वागतम" का बैनर लगा था।मंद-मंद संगीत की धुन सुनाई दे रही थी। आज यहां "परिवार दिवस" मनाया जा रहा था। 
         सूरजसिंह एक अति साधारण परिवार से आये थे । उनके पिता लालसिंह एक छोटी- सी जमीन की टुकड़ी के मालिक थे जिस पर उनकी छोटी खपरैल वाली मकान थी। गांव में उनकी अच्छे वैद्य के नाम से पहचान थी। उस वैद्य के पेशे से जो कुछ मिलता और जमीन में होनेवाली थोड़ी बहुत फसल से वे गृहस्थी की गाड़ी खींचते थे। लालसिंह का परिवार बहुत बड़ा था। पत्नी ,बेटे ,बेटियां सब कुल मिलाकर दस जनों का कुटुंब था। सूरजसिंह उनके संतान में सबसे बड़े थे।
सूरजसिंह गांव के हाईस्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली थी। उस जमाने में मैट्रिक पास करना बड़ी उपलब्धि माना जाता था। पढ़ाई पूरी कर उन्होंने एक अच्छी नौकरी की खोज में  गांव छोड़कर निकल पड़े। घूमते-घूमते वे चक्रधरपुर नामक शहर पहुंचे, जहां उनके बिरादरी का एक सज्जन मिल गया। उन्होंने सूरजसिंह की आवभगत की और उन्हें अपने ही घर पर टिका दिया। वे सज्जन रेलवे में तारबाबू की नौकरी करते थे। उन्होंने सूरजसिंह को रोज दफ्तर ले जाकर तार-संप्रेषण (टेलीग्राफ) करना सिखाया। केवल तीन महीने में  सूरजसिंह तार संप्रेषण की कला में पारंगत हो गये। उन सज्जन ने अधिकारियों से कहकर उन्हें भी वहीं चक्रधरपुर में रेलवे में तारबाबू की नौकरी लगवा दी। नौकरी लगते ही सूरजसिंह के पिता ने उनकी शादी करवा दी।
  इधर कुछ दिनों के बाद सूरजसिंह के पिता की मृत्यु हो गई थी। सूरजसिंह एक श्रेष्ठ इन्सान थे। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने सदा ही अपने भाई -बहनों की देखभाल की। भाईयों को अपने पैरों पर खड़ा किया और बहनों का ब्याह कराया। उन्होंने सभी भाईयों को नौकरी लगवाई और बहनों का ब्याह कराया। उनके भाई नौकरी के चलते दूर चले गये। उन्होंने गांव की उस पैतृक निवास को बेच दी और अपने अपने परिवार  में ही रम गये। भाई सब एक दूसरे से दूर हो गये।
     सूरजसिंह एक निष्ठावान व्यक्ति थे । उन्होंने अपने पिता को कठिन परिस्थिति में घर -परिवार चलाते देखा था। उन्होंने पिता को परिवार के सभी सदस्यों को संगठित कर रखते देखा था। उन्होंने  सोचा कि परिवार को एकजुट करके रखना है और हमेशा उनका यह प्रयत्न रहा। वे बड़े धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। सुबह उठकर स्नानादि से निवृत्त हो पूजा पाठ में लग जाते और फिर कार्यालय से शाम को आते ही पूजन और कीर्तन में लग जाते। वे अतिथियों को भगवान मानते थे और बड़ा सम्मान करते थे। सूरजसिंह के पांच बेटे  -श्रीराम सिंह, कृष्णसिंह, गोविंद सिंह ,हरि सिंह और महादेव सिंह और तीन बेटियां थी। उनका यह बड़ा परिवार रेलवे क्वार्टर में रहता था। 
उन्होंने सभी बेटियों का विवाह कर दिया। उनके पांचों बेटे को उसी शहर चक्रधरपुर में रेलवे में ही नौकरी करने लगे। सूरजसिंह के बेटे तीन रेलवे क्वार्टर्स में रहते, पर रसोई सूरजसिंह के क्वार्टर में ही होती। रोज सुबह के चाय -नाश्ते से लेकर रात के भोजन तक सभी पिता के क्वार्टर में ही आते और एक साथ खाना-पीना,उठनाआदि होता। पांचों बेटों का स्वाभाव अलग-अलग था।  श्रीराम  सिंह बिलकुल शांत और गंभीर थे,वहीं कृष्णसिंह बड़े क्रोधी पर मन के बड़े अच्छे थे। गोविंद सिंह हंसमुख थेऔर बच्चों से बहुत प्यार करते थे। हरिसिंह मस्तमौला थे तो वहीं महादेव सिंह बड़े मजाकिया स्वाभाव के थे। इस तरह भिन्न-भिन्न स्वाभाव के होते हुए भी सभी साथ-साथ होते थे।  सूरजसिंह ने सभी बेटों का अच्छे खानदान की लड़कियों को देखकर विवाह कराया। सभी बहुयें सगी बहनों जैसे रहती थी। कुछ साल में सूरजसिंह का घर पोते -पोतियों की हँसी और खेलकूद से गूंजने लगी। सूरजसिंह का परिवार अब एक भरापूरा और सुखी परिवार था । सूरजसिंह रिटायर होकर अपना क्वार्टर अपने एक और बैटे के नाम करा दिया और अब वे आराम से बहू बेटों और पोते पोतियों के साथ आनंद से भजन कीर्तन करते हुए दिन गुजार रहे थे।सूरजसिंह का परिवार  शहर में एक आदर्श खुशहाल परिवार के रूप में जाना जाता था। ऐसा नहीं कि घर में कुछ  वाद-विवाद नहीं होता ,पर सूरजसिंह की एक डाँट से सब शांत हो जाते। कृष्णसिंह कभी किसी पर क्रोधित हो जाते पर दूसरे ही क्षण पिघल जाते। उन्हें अफसोस होता और वे शाम को ढेर सारे मिठाईयाँ लाते और घर का वातावरण हल्का कर देते। कुल मिलाकर वह एक हँसता -खेलता सुखी और खुशहाल परिवार था।
  सूरजसिंह के बड़े बेटे श्रीरामसिंह का दूसरे शहर खड़गपुर में तबादला हो गया था। संयुक्त परिवार से उन्हें अलग होकर जाना बहुत खल रहा था, पर नौकरी के चलते उन्हें चक्रधरपुर से बाहर जाना पड़ा। पर परिवार का वह संबंध अटूट था। वे हर महीने दो महीने चक्रधरपुर जाते और परिवार का हालचाल जानकर आते।
   श्रीरामसिंह के चार बेटे और दो बेटियां थी। वे बड़े ही कर्मनिष्ठ और संस्कारी व्यक्ति थे। उन्होंने भी अपने पिता की ही भांति अपने परिवार को हमेशा एकजुट रखने का काम किया।  उनके बड़े बेटे विनायक सिंह भी रेलवे में नौकरी करते थे और दूसरा बेटा शेषसिंह बैंक में नौकरी करता था। तीसरा बेटा गोपाल सिंह स्कूल में शिक्षक था और सबसे छोटा श्रीनिवास सिंह पढ़ाई कर रहा था। श्रीरामसिंह तीनों बेटों का विवाह कराया। श्रीरामसिंह ,उनकी पत्नी सीतादेवी, चारों बेटे और तीनों बहुयें सब मिलकर  रेलवे क्वार्टर में रहते थे। श्रीरामसिंह ने बड़े बेटे को अपने क्वार्टर के ऊपरवाला क्वार्टर बड़े बेटे को आबंटित करवाया। इन दोनों क्वार्टर्स में सभी मिलजुलकर रहते थे। फिर उनके पोते- पोतियाँ हुई। सभी बड़े आनंद से रहते थे। सबका एक रसोई बनता था और सभी हल्ला- गुल्ला, हँसी-मजाक करते भोजन करते। 
कुछ वर्षों के बाद श्रीरामसिंह नौकरी से रिटायर हुए। उन्होंनें रिटायरमेंट के पैसों से एक विशाल घर बनवाया ।उस घर का नाम उन्होंने "सीताराम विला" रखा। सभी बेटे बहुओं के साथ वे उसमें बड़े आनंद से रहने लगे। शहर के लोग उस "सीताराम विला" और उसमें रहने वालों की खूब बढ़ाई करते थे।
  कुछ साल बाद सबसे छोटे बेटे श्रीनिवास सिंह को नौकरी लगी और उसे बाहर जाना पड़ा। श्रीरामसिंह उसकी भी शादी करवाई ।पर उसका अकेले  बहू और पोते के साथ दूर रहना बहुत खलता था। वे कभी -कभी उदास हो जाते। इसके बाद दूसरे  बेटे शेष सिंह और तीसरे बेटे गोपाल सिंह क़ो भी नौकरी में तबादले के चलते बाहर जाना पड़ा। अब सिर्फ बड़ा बेटा विनायकसिंह अपनी पत्नी और पुत्र के साथ उनके साथ रहता था। श्रीरामसिंह अब बहुत उदास रहते। तीनों बेटे अक्सर परिवार के साथ आते और कुछ दिन मातापिता के साथ गुजारकर वापस जाते। वे जब आते तो खुशी छा जाता ,मगर जब वे जाने लगते तो श्रीरामसिंह और सीतादेवी काफी उदास हो जाते।
  श्रीरामसिंह के सभी बेटे बेटियों ने इस मामले में आपस में विचार-विमर्श किया। माँ-बाप की इस उदासी को दूर करनेके लिये उन्होंने एक उपाय सोचा। उन्होंने ठीक किया कि वे सभी अपने -अपने परिवार समेत एक ही साथ खड़गपुर अपने घर जायेंगे और एक हफ्ता साथ-साथ बितायेंगे। इससे परिवार में खुशी का माहौल बन जायेगा। इसलिए उन्होंने हर साल "परिवार दिवस" या" फैमिली डे"  मनाने का निश्चय किया। काफी सोच विचार के बाद उन्होंने अपने माता-पिता के विवाह का दिन इस आयोजन के लिए उपयुक्त समझा।
   कुछ दिन बाद श्रीरामसिंह के सभी बेटे बेटियां  अपने -अपने परिवार समेत एक साथ उनके घर आ गये। उनको माजरा क्या है कुछ समझ में नहीं आया। सीतादेवी को भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। बेटे बेटियां कोई कुछ नहीं बोल रहा था। सभी अपने -अपने काम में व्यस्त थे। बड़े बेटे विनायक सिंह ने पहले ही सब इंतजाम कर रखा था। कुछ लोग आकर घर को लाइटिंग वगैरह कर बैनर आदि लगा दिये। शाम होते ही "सीताराम विला " रंग- बिरंगी रोशनी में नहा उठा।  एक बैनर " हैप्पी फैमिली डे" रंगीन रोशनी में चमक रहा था।शाम को कैटरिंग वाले आकर गार्डेन एरिया में कुर्सी मेज आदि लगा दिये। कैटरिंग की पूरी व्यवस्था की गई थी। श्रीरामसिंह ने बड़े बेटे से पूछा कि यह सब क्या हो रहा है। वह सिर्फ मुस्कुरा कर रह गया। कोई बेटा या बेटी माता -पिता को कुछ बता रहे थे। बहुयें और दामाद मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।
   दूसरे दिन सुबह उठते ही बाबूजी और माँजी को सभी लोग "हैप्पी वेडिंग एनिवर्सरी "कहते हुए अभिवादन करने लगे। तब श्रीरामसिंह और सीतादेवी को सारी बात समझ में आई। सीतादेवी का चेहरा तो शर्म से लाल हो गया। बाबूजी बड़े असहज महसूस कर रहे थे। कैटरिंग वाले ब्रेकफास्ट का इंतजाम किये। बाबूजी और माँजी कभी शादी की सालगिरह मनाये ही नहीं थे।उन्हें वह तारीख याद भी नहीं रहती।सभीमिलकर नाश्ता करने लगे। माँ और बाबूजी को बगल-बगल बैठाया गया। तब बेटे,बेटियां,बहुयें और दामाद उन्हें समझाया कि वे दोनों जीवन भर उनके लिये अपनी खुशियाँ कुर्बान कर दिये ,इसलिए अब उनकी खुशियों के लिये वे यह सब कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले संयुक्त परिवार था,परंतु परिस्थितियों के अनुरूप सभी को दूर दूर जाना पड़ा। और अब वे दोनों उदास रहने लगे हैं। अतः उन दोनोंकी उदासी दूर करने के लिये यह आयोजन किया गया है, ताकि परिवार के सभी लोग एक साथ एकत्रित होकर खुशी मनायें। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह हर साल यह परिवार दिवस मनाया जायेगा और हफ्ते भर सभी लोग मिलजुलकर रहेंगे और खुशियां मनायेंगे। श्रीरामसिंह और सीतादेवी का हृदय गदगद् हो गया।
शाम को रंगारंग कार्यक्रम हुआ। एक मंच बनाया गया। मंच पर दो सुंदर कुर्सियां लगाई गई और उस पर बाबूजी और माँ जी को बैठाया गया।  फिर केक काटा गया।सबसे पहले बड़े बेटे विनायक सिंह ने मंच पर आकर अपने माता पिता को धन्यवाद कहा और उनके त्याग और प्रैम के बारे में कहा। यही नहीं उन्होंने अपने दादाजी सूरजसिंह की जीवनी और उनके समय से आ रहे संयुक्त परिवार के बारे में कहा।उन्होंने कहा कि इस परिवार दिवस के उपलक्ष्य में हम अपने दादा परदादा के समय से लेकर अब तक अपने परिवार के सभी पूर्वजों को भी याद कर उनकी जीवनी से सीख लेंगे। फिर उन्होंने मंचपर आसीन अपने माता-पिता का चरण स्पर्श किया। परिवार के सभी सदस्य मंच पर आकर अपनी अपनी बात रखी। फिर नाच, गाना ,अभिनय आदि का दौर चला। सभी ने श्रीरामसिंह और सीतादेवी को कई कीमती उपहार दिये। रात को जब सोने गये तो श्रीरामसिंह और सीतादेवी की आंखों में  आनंद के आंसू थे। उनका दिल बार-बार सभी बच्चों को आशीर्वाद दे रहा था। 
    तब से हर साल "सीताराम विला"में हर साल यह परिवार दिवस मनाया जाता है । अब श्रीरामसिंह और सीतादेवी इस संसार में नहीं हैं, पर उनकी याद में उनके शादी की सालगिरह के दिन परिवार दिवस मनाया जाता है। सभी परिवार वाले उस दिन चाहे जहां भी हों ,आते हैं और संयुक्त परिवार के महत्व को दर्शाते हैं। बच्चों को उनके पूर्वजों के जीवनी के बारे में बताया जाता है।
यही है "सीताराम विला"के "परिवार दिवस" की अनोखी कहानी।
  ---पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर"