सूखते हुए 
दरख्तों पर अक्सर कोपलें फूट आती हैं तुम्हारी यादों की तरह--
और चुपचाप कराती हैं अहसास - ए-जिंदगी 
बेनूर नहीं तुम्हारे वादों की तरह-
तुमको शायद 
याद हो न वह दरख्त, वह बहता झरना, आकाश और जमीं
पर कैसे कह दूं सभी आज भी 
महकते हैं तेरी गंध लिए मेरी फरियाद की तरह--
बस ये आंखे और दिल
बेजार होकर आज भी  इंतजार - ए-इश्क में
न जाने क्यों 
कुछ खोजता रहता है रातों को
मेहताब की तरह--
तुम्हारी यादें 
बारिश की बूदों की तरह 
जब भी आंखों से पिघल जाती है-
लाख रोकने पर अहसास - ए-मोहब्बत 
कह जाती हैं-
तब धुंधलाते कैनवास पर दर
अक्सर तुम्हारी तश्वीर उभर आती है 
अक्स की तरह--


                                        राजीव रावत