वो जिस पर उसकी रहमत हो,
तमन्ना न उसे कोई।
प्रेम जो उससे कर बैठा,
जरूरत न उसे कोई।।
किया था इश्क मीरा ने,
पिया था विष भरा प्याला,
दिए थे कष्ट राणा ने,
नही फिर भी तनिक रोइ।।
प्रीति की रीति सच्ची थी,
जब बांधा प्रेम का धागा।
उतारा कर्ज धागे का भिगों,
पलकों को जब रोई।।
प्रेम की इक झलक देखी थी,
हमने व्रज की गलियों में।
प्रेम की पूर्ण परिभाषा,
धर्म ग्रन्थों ने बतलाई।।
प्रेम गर दिल में सच्चा हो तो,
निश्चित जीत प्रेमी की।
पपीहे की थी रट सच्ची,
घटा बन स्वाति जब आई।।
शीला द्विवेदी

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