देखा  दूर  कहीं  अंतरिक्ष   में ,
वह अति मनोरम दृश्य एक था।
चित्रपटल पर इक चित्रकार ने,
ज्यों  तूलिका  से  चित्र  उकेरा।।

रंग -बिरंगे  ग्रहों  से  था  भरा,
नक्षत्र हजारों  बिखरे हुए  सा।
अंतरिक्ष ध्वनि ओंकारनाद सा
रहस्यमयी   परिवेश   हो  रहा ।।

अंतरिक्ष भर  गया विमानों से,
देव,यक्ष, गंधर्व,हरि,विरंचि भी,
सपत्नीक  कहीं  चले  जा  रहे ,
चहुँओर पुष्पवृष्टि भी हो   रही ।।

नारद, तुंबरु  तान  छेड़   रहे,
वीणा  पर  गान  वे  कर  रहे।
अप्सराएं  नाचती  चल   रही,
अद्भुत दृश्य वे सृजन कर रहे।।




जा  रहे  ये देव  सभी  कहाँ,
मैं मंत्रमुग्ध सा देख रहा  था।
देखा  मैं  कि सभी चले जहाँ,
पर्वतराज हिमालय खड़ा था।।

हिमवान औ' मैनावती की ,
बेटी पार्वती  का ब्याह था।
दूल्हा  बन  पधारे शिवजी,
वहीं  जा  रहे  सभी देवता ।।

मैं  मंत्रमुग्ध- सा  देख  रहा  था,
मंगल परिणय शिव -पार्वती का ।
माँ  की  पुकार  सुन  जाग  उठा, 
जाना कि वह एक दिव्य स्वप्न था।

पार्वतीमंगल की  कथा सुनी,
मैंने  जो  माता के  मुख  से।
उस अनुपम दृश्य को मैंने भी,
देखी  दूर  कहीं  अंतरिक्ष  में ।।

- पेरी सूर्यनारायण मूर्ती   "दिवाकर "
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकारसुरक्षित।)
(मुखचित्र  और अन्य गूगल से साभार।)