महानगर की दौड़ती भागती जिंदगी, गाडियों के हॉर्न कि बेसुरी आवाजे, ट्राम,मेट्रो के लिए दौड़ते लोग।हर तरफ शोर गुल।किसी को किसी के लिए समय नहीं ।
ऐसे ही एक सुबह थी आज,प्रिया  ब्यूटी पार्लर के लिए निकली थी,आज कोई स्पेशल व्यक्ति आने वाला था उसके पार्लर में,तेज़ तेज़ कदम  से वो आगे बढ़ रही थी , कि अचानक पीछे से आवाज़ आई।
रूपा, रुपा.......।

प्रिया,  पीछे से  आती  आवाज़ सुन  घूमी, पलट कर देखा.....
सामने एक स्मार्ट नौजवान उसे पुकार रहा था।🙎
है ,कौन यह नौजवान ? जिसने उसे रूपा  कह पुकारा। वह अपने विचारो में खोई ,ठिठक गई।तब तक वह नौजवान उसके निकट पहुंच चुका था।
जोर से चिल्लाया _अरे रुपा ,पहचाना नहीं?  

कौन हैं आप ? 🙄

अरे मैं संजय ,😀वो मुस्काया।
पर कौन हैं आप?? उसने फिर से प्रश्न दुहराया । मै आपको नहीं जानती ,और वैसे मैं बता दूं, कि मेरा नाम प्रिया है, रुपा नहीं।अब मुझे देर हो रही है,वैसे भी आपने मेरा काफी  वक्त बर्बाद कर दिया है।

संजय को इस जवाब की उम्मीद नहीं थी।फिर उसने सोचा शायद कोई गलतफहमी हो गई । और फिर वो मेट्रो पकड़ कॉलेज निकल गया।

आज कॉलेज में उसका पहला दिन था,उसकी नियुक्ति मैनेजमेंट कॉलेज में लेक्चरर के रूप में हुई थी।एक दूसरे से परिचय करने , कराने में ही बहुत समय निकल गया,तो कॉलेज के डीन ने उसे छुट्टी दे दी कि आप कल से क्लास लीजिएगा ।

यहीं कैंपस में ही आपके रहने का इंतजाम कुछ दिनों बाद हो जाएगा।

संजय लौट आया,अपने होटल में,जहां वो रुका था।
दीवारों की तरफ देखता,वो आज की बात भूल नहीं पा रहा था ,उसे पूरा यकीन था ,कि वो रूपा ही थी,लेकिन रूपा उसे पहचानने से क्यों इनकार करती,बल्कि वो तो खुश होती ।

जब वो एक दूसरे से अलग हुए थे तो उसकी उम्र 12  साल की थी ,और रूपा 10 साल की थी।दोनों गुजरात के मेहसाणा में रहते थे।

संजय के पिता बैंक में नौकरी करते थे ,उनका स्थानांतरण अलग अलग शहरों में होता था।

कल संजय के परिवार को जाना था ,रूपा रो रही थी,संजय ने उसके आंसू पोछे और बोला , पगली रोती क्यों है? मै कहां तेरे से दूर जा रहा ।चल हमदोनो अपने हाथों में एक दूसरे के नाम का टैटू  बनवा लेते हैं।ये हर पल हमे एक दूसरे को याद दिलाते रहेंगे।

अचानक दरवाजे की घंटी बजती है,..............

                           शेष अगले अंक में
स्वरचित_संगीता