एक धर्मगुरु एक सराय में आकर ठहरा । उसने अपना घोड़ा झाड़ के नीचे बांधा । मुल्ला नसरुद्दीन यह देख रहा था । घोड़ा बहुत प्यारा था और बड़ा कीमती था । धर्मगुरु प्रसिद्ध था,अपने घोड़े से उसका बड़ा लगाव था । वह दूर-दूर की यात्रा अपने घोड़े पर करता था । वह दोपहर के विश्राम के लिए रुका ।
मुल्ला नसरुद्दीन घोड़े के पास गया । घोड़े को सहलाया । जब वह घोड़े को सहला रहा था और खुश हो रहा था - घोड़ा सच में बड़ा बहुमूल्य था । तभी एक घोड़े का खरीदार पास से निकलता था ।
उसने नसरुद्दीन से कहा, "तुम्हारा घोड़ा है ?"
अब इतना शानदार घोड़ा । कहना मुश्किल हो गया कि अपना नहीं है ।
नसरुद्दीन ने कहा, "हां अपना ही है ।"
उस आदमी ने कहा, "बेचते हो ?"
बात में बात बढ़ गई ।
नसरुद्दीन ने कहा, "खरीदने की हिम्मत है ?"
हजार रुपए का घोड़ा था, नसरुद्दीन ने दो हजार रुपए
मांगे । ना कोई देगा, ना कोई बात उठेगी, बात खत्म हो जाएगी । लेकिन वह आदमी दो हजार देने को तैयार हो गया । अब बात यहां तक बढ़ गई कि पीछे लौटना मुश्किल हो गया । तो उसने बेच दिया ।
उसने सोचा, ऐसा कुछ हर्जा भी क्या है ? दो हजार मुफ्त हाथ लग रहे हैं और धर्मगुरु सोया हुआ है ।
खरीदार घोड़ा लेकर जा चुका था । वह दो हजार गिन कर जेब में रख ही रहा था, धर्मगुरु बाहर आया । भागने का मौका ना मिला । जल्दी से रुपए उसने जेब में रख लिये । अब क्या करें ? कुछ सूझा नहीं, तो जहां घोड़ा खड़ा था, वहां घोड़े की रस्सी अपने गले में डालकर और घास का एक टुकड़ा मुंह में लेकर खड़ा हो गया ।
धर्मगुरू बहुत घबराया । देखी उसने यह हालत, तो उसके भी हाथ पैर कांप गए कि यह हुआ क्या है ? यह मामला क्या है ?
उसने कहा, "भाई यह क्या कर रहे हो ? बात क्या है ?"
नसरुद्दीन ने कहा, "अब आपसे क्या छुपाना । सच बात कह दूं ?"
उस धर्मगुरु ने कहा, "मुझे तुम्हारी सच बात जानने का कोई प्रयोजन नहीं । मैं यह पूछता हूं, मेरा घोड़ा कहां है ? क्योंकि तुम तो मुझे आदमी पागल मालूम पड़ते हो । मेरा घोड़ा कहां है ?"
नसरुद्दीन ने कहा, "आपके घोड़े की बात और मेरी बात दो अलग-अलग बात नहीं है । मैं ही आपका घोड़ा हूं ।"
धर्मगुरु ने कहा, "यह तुम क्या कह रहे हो ? होश में हो ? पागल हो ? क्या मामला है ?"
नसरुद्दीन ने कहा, "आप पूरी कहानी सुन ले । बीस साल पहले एक स्त्री के साथ मैंने पाप किया । परमात्मा बहुत नाराज हो गया और उसने गुस्से में मुझे घोड़ा बना दिया - आपका घोड़ा । ऐसा मालूम होता है कि मेरा दंड पूरा हो गया है और मैं वापस आदमी हो गया हूं । मेरा नाम नसरुद्दीन है ।"
धर्मगुरु भी घबरा गया । परमात्मा की ऐसी नाराजगी कि आदमी को घोड़ा बना दिया । एक दम घुटने पर टिक गया । खुद भी परमात्मा से प्रार्थना की, 'क्षमा कर, पाप तो मैंने भी बहुत किए हैं । मगर दया कर । तेरी अनुकंपा का सहारा मांगता हूं ।'
फिर उसने नसरुद्दीन से कहा, "भाई यह तो ठीक है, अब मुझे आगे जाना है । अब जो हुआ, हुआ । तुम अपने घर जाओ और मैं बाजार जा कर दूसरा घोड़ा खरीद लूं ।"
वह बाजार गया तो घोड़े बेचने वाले की दुकान पर उसने अपने घोड़े को खड़ा पाया । तो और उसकी छाती घबड़ा गई ।
वह पास गया घोड़े के और कान में बोला, "नसरुद्दीन फिर से ? इतनी जल्दी ?"

0 टिप्पणियाँ