दुनिया में अब तक रहा, कष्टों से भरपूर।
वो ही अपने देश में, कहलाया मजदूर।।
जीवन तंगी में जिआ, रहे सदा बेहाल।
मजदूरों की चाह बस, रोटी चावल दाल।।
बना रहे घर रोज पर, मिला नहीं घर एक।
मजदूरों ने झोपड़ा, समझ लिया है नेक।।
नहीं देखते रात दिन, करते हैं बस काम।
उन मजदूरों को मिले, बस कुछ रुपया दाम।।
जिनकी मेहनत से हुआ, और धनी हर सेठ।
उन मजदूरों का रहा, हर पल भूखा पेट।।
नहा पसीने से गया, मिली न उसको छांव।
कांटों में मजदूर वह, चलता नंगे पांव।।
अपने बच्चों के लिए,दिला सका नहिं ज्ञान।
मजदूरों की राह कब, होती है आसान।।
श्रमिक दिवस पर कर रहे, घोषणाएं तो खूब।
लेकिन हर मजदूर अब, रहा कष्ट में डूब।।
श्वेता कर्ण

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