मैं हूँ इक चायवाला
पौ फटते ही सुबह सबेरा,
अपने धुन में चलता जाता ।
टपरी अपनी रोज सजाता,
रोज मैं काम में लग जाता । ।
मैं हूँ इक चायवाला ।
सबसे प्यारा सबसे न्यारा,
चाय पिलाना काम हमारा ।
गर्म चाय की प्याली देता,
करता सबको मैं जोश भरा।।
मैं हूँ इक चायवाला ।
कड़क,मलाईदार और मीठा,
इलायची या अदरखवाला ।
बिना दूध का या शक्कर का,
चाय पिलाता मैं मतवाला।
मैं हूँ इक चायवाला।
सब ग्राहक हैं मेरे गुन का,
मेरे चाय का बोलबाला।
सबसे ही है स्नेह हमारा,
मेरा चाय बड़ा अलबेला।।
मैं हूँ इक चायवाला।।
क्या नेता औ' क्या अभिनेता,
अफसर ,सेठ या रिक्शे वाला।
यहां न भेदभाव की छाया,
मैं एक चायवाला निराला।।
मैं हूँ इक चाय वाला।।
सुबह ही मैं अपने चाय से,
सभी के तन में चुस्ती लाता।
शाम थके हुए मुसाफिरों के,
मन में बड़ी ताजगी लाता।।
मैं हूँ इक चायवाला।।
----पेरी सूर्यनारायण मूर्ती " दिवाकर "
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)
(२१ मई को विश्व चाय दिवस के अवसर पर)

0 टिप्पणियाँ