तेरे प्यार का खोया हो और मेरे प्यार की चीनी हो,
मिल जाये यदि दोनों तो हर दिन रात सुहानी हो।
तेरे घर जब आयी थी तो फीका सा मैं खोया थी,
घुली तेरे प्यार की चीनी में तो बनी स्वादिष्ट मिठाई थी।
रसगुल्ला से बनकर आये मेरे सूने जीवन में,
बनी चाशनी तेरी मैं फिर समा गई तेरे अंग-अंग में।
मैं थी इक कड़वा फल तेरा साथ पाकर आगरा के पेठा बन गयी,
मिला जब प्यार तेरा तो फिर राजस्थानी घेवर बन गयी।
मैं एक अस्तित्व हीन बिखरी हुई सी बूंदी थी,
तेरा प्यार और विश्वास पाकर मोतीचूर बन गयी।
मैं रंग गुलाबी गाजर थी तेरे प्यार की खुशबू से
फिर हलुआ बन गयी।
शीला द्विवेदी"अक्षरा"

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