ऋषी मुनि का धर कर वेश
अपना अवध छोड़कर देश
प्रिय तुम वन में चले गये....
क्या मेरा नहीं था संज्ञान
या हृदय हो गया था पाषाण
प्रिय तुम वन चले गये
हड्डियों का ढांचा हूँ अवशेष
कैसे बिताऊँगी जीवन शेष
प्रिय तुम वन चले गये
यादें हमारी आतीं होंगीं
तुम्हें, ख़ूब , रुलाती होंगीं
भाई, से रिश्ता निभाकर
मेरी मधुर स्मृति बिसराकर
प्रिय, तुम वन चले गए.....
भ्राता संग काटोगे वनवास
चौदह बरस,रखूँगी मैं आस
प्रिय, तुम वन चले गए
पिता समान, राम तुम संग
और माता समान है सीते
कैसे रह पाऊंगी तुम बिन
मर जाऊंगी अकेले जीते
क़िस्मत की गगरी फ़ूटी
मेरे नैनों के नसागर रीते
प्रिय तुम वन चले गये
प्रभु के हम भी पैर दबाते
मुझको संग लेकर जाते
मुझे क्यूं,छोड़, चले गये
प्रिय तुम वन चले गये
भूपेन्द्र चौहान “राज़”

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