"इतने दर्द छुपे इस दिल में,
हर पल जिनको गोड़ रही मैं,
भूल ना जाऊं याद पुरानी,
हर पल यादें मोड़ रही मैं।।

दर्द मिला है मुझको गहरा,
लगता है जैसे सागर हो।
दर्द भूलाने जख्म सुखाने,
खुद ही खुद को तोड़ रही मैं ।।

शब्दों के जो तीर चुभे हैं,
जिनसे है मन मेरा घायल।
करने खुद को खुद से दूर
अपनों से नाता तोड़ रही मैं।।

क्षमा नहीं कर पाऊं ख़ुद को,
अपने को ही सज़ा दे रही ।
सच को यूं स्वीकार किया है,
खुद से रिश्ता तोड़ रही मैं।।

आज अंबिका यूं आहत है,
अपने ही मन की पीड़ा से।
सूख ना जाए अन्तःस् पीड़ा
अस्क से रिश्ता जोड़ रही मैं।।"
                 अम्बिका झा ✍️