कभी लाती है  दुःखों की बाढ़ तो कभी जन्नत से भी खूबसूरत नज़र आती है जिंदगी,
कराती है जो दुनियां की हकीकत से रूबरू वो "सुख दुःख का संगम है जिंदगी"।

कभी फूल पत्तियों सी कोमल तो कभी कांटों सी चुभन देती है ,
कभी ले जाती है आसमाँ की ऊंचाइयों पर तो कभी जमीं से भी नीचे गिराती है जिंदगी।

तपिश में चलते हुए राही को कभी शीतल सी छाया प्रदान करती है, 
बन जाती है कभी  मोहिनी तो फिर अमृत पान भी कराती है जिंदगी।

देती है कभी चाँद सी शीतलता तो कभी सूर्य सी तपिश भी देती है,
कभी बनती है अमावस की काली रात तो कभी पूर्णिमा सी रौशन होती है जिंदगी।

होती है कभी खारे समुद्र सी तो कभी गंगा जल सी मिठास लाती है,
कहते है जिसको गंगा सागर वो अनुपम प्रेम का समंदर है जिंदगी।

पतझड़ बन कर आती है कभी तो कभी बसन्त सी बाहर लाती है,
बनती है कभी रंग फागुन का तो कभी सावन की बौछार है जिंदगी।

दुःखों की काली रात में कभी जुगनू सी उम्मीद बन कर आती है,

मिलता है सहारा तिनके का जब तो दुखों की नैया पार लगती है जिंदगी।

डट कर करते है सामना जो जीवन की हर चुनौती का उनके लिए फिर आसान सी होती है जिंदगी,
इसीलिए तो कहते है कि "सुख दुख का संगम है जिंदगी"।।



शीला द्विवेदी"अक्षरा"