आज संपूर्ण संसार विलासिता और आराम के साथ जिंदगी जीना चाहता है । इसके लिए इंसान को बहुत सारा पैसा चाहिए और पैसा मेहनत से कमाए जाते हैं और बहुत सारे पैसे कमाने में वक्त भी लगता है लेकिन स्वार्थी इंसानों को बहुत जल्द और बहुत सारे पैसे चाहिए होते हैं । पैसे पाने के लिए वह अपराध करने से भी नहीं हिचकिचाते। अधिकांश अपराधों के पीछे अहम वजह पैसा और खुद का स्वार्थ छिपा होता है। लूट-पाट , डकैती , चोरी और यहां तक कि हत्या के लिए भी पहली प्राथमिकता पैसा ही होता है। ये अलग बात है कि अपराधी इन पैसों का उपयोग कर पाता है या नहीं क्योंकि कहते हैं ना अपराध कभी नहीं छुपता कभी ना कभी बाहर अवश्य आता है । लेकिन आगे जो मैं आपको सत्य घटना का वर्णन करने जा रही हूॅं उसमें सोचने वाली बात यह है कि उस फिल्म मेकर के साथ जो कुछ भी घटित हुआ उसमें क्या अपराध करने वाले की ही गलती थी ????
यह एक सत्य घटना है इसमें एक फिल्म मेकर अपने बेटे को लेकर फिल्म बना रहे थे । उन्होंने अपना पूरा पैसा इस फिल्म में लगा दिया था । उनकी फिल्म हिट होने के ज्यादा ही चांसेज थे क्योंकि इससे पहले इन्होंने जो भी फिल्म अपने बेटे के साथ मिलकर बनाई थी वो सुपर हिट हुई थी इसलिए उनके साथ- साथ सबको पूरा विश्वास था कि यह फिल्म दो सौ करोड़ से ज्यादा ही कमायेगी। फिल्म की शूटिंग भी लगभग समाप्त होने ही वाली थी लेकिन अभी तक हुई नहीं थी । एक दिन फिल्म मेकर साहब अपने आफिस में बैठे फिल्म का काम निपटा ही रहे थे कि चार लोग बेधड़क उनके आफिस में घुस गए। पूछने पर पता चला कि वे सी. बी. आई. के आदमी हैं और फिल्म मेकर साहब के खिलाफ पहले से चल रहे एक केस के सिलसिले में उनसे बातचीत करने आए हैं । सी. बी. आई. के लोगों ने आफिस की तलाशी भी शुरू कर दी और आफिस के सारे लोगों के मोबाइल फोन भी जमा कर लिए ताकि कोई किसी को फोन ना कर सके। फिल्म मेकर साहब चारों के सामने गिड़गिड़ाने लगे कहने लगे कि अगर सी. बी. आई. के छापे की बात फिल्म इंडस्ट्री में फैल गई तो मेरी फिल्म रिलीज से पहले ही फ्लाप हो जाएगी । चारों ने बातों ही बातों में उन्हें कहा कि अगर वो दस करोड़ उन्हें दे दें तो वे ये पैसे सी. बी.आई. ऑफिस में जमा कराके मामले को रूकवा देंगे और बाद में मामला रफा-दफा हो जाएगा। फिल्म मेकर साहब ने बिना सोचे समझे कहा कि अभी तो मेरे पास उतने पैसे नहीं हैं लेकिन मैं इंतजाम कर लूॅंगा आप मुझे बस एक दिन का समय दीजिए। उस समय फिल्म मेकर साहब के ऑफिस में एक लाख रुपए थे वो लेकर वे कल का दिन देकर चले गए। फिल्म मेकर साहब अपने इन्वेस्टर के पास पैसे लेने गए लेकिन सबने कुछ ना कुछ कहकर मना कर दिया। इस तरह एक दिन बीतने के बाद भी पैसों का इंतजाम नहीं हो पाया। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी और अपने बेटे के अकाउंट से एक करोड़ निकाल कर सी.बी.आई. वाले को दिया और उन लोगों ने बाकी के बचे पैसों के लिए तीन दिन का वक्त देकर वो चले गए। इन तीन दिनों में फिल्म मेकर साहब ने अपने बंगले को बेचकर बाकी बचे पैसों का इंतजाम कर लिया और चौथे दिन अपने , ऑफिस में उन चारों का इंतजार करने लगे । पूरा दिन बीतने के बाद भी वो लोग जब नहीं आए तो पहली बार फिल्म फेयर साहब का माथा ठनका। वे अगले दिन डरते- डरते सी.बी.आई.ऑफिस पहुॅंचे । वहां जाकर उन्हें पता चला कि यहां से तो कोई रेड हुई ही नहीं और उन्हें नकली सी.बी.आई.बनकर उन चारों अपराधियों ने लूटा है।फिल्म मेकर साहब ने अपनी आपबीती असली सी.बी.आई. के सामने सुनाई। फिल्म मेकर साहब को उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया गया और वे दुखी मन से अपने घर वापस आएं। यहां सवाल उठता है कि क्या फिल्म मेकर साहब को समझौता करने के बिषय में सोचना चाहिए था ???? अगर उन्हें दस करोड़ फाईन ही भरने थे तो क्या वे सी.बी.आई के आफिस में ये रकम जमा करेंगे नहीं कह सकते थे ?? क्या इन दो दिनों में उनको उन चारों पर बिल्कुल भी संदेह नहीं हुआ??? और सबसे बड़ा अपराध उन्होंने यह किया कि उनके साथ समझौता किया क्योंकि सबसे बड़ा अपराध अन्याय सहना और गलत तरीके से समझौता करना होता है।अब सवाल उठता है कि फिल्म मेकर साहब के अपराधी कौन थे??? मेरा ऐसा मानना है कि फिल्म मेकर साहब के सबसे पहले अपराधी तो वो खुद ही है क्योंकि उन्होंने गलत तरीके से समझौता किया । चलो मान भी लेते हैं कि उन्हें बिल्कुल भी पता नहीं चला कि वो चारों गलत लोग थे लेकिन उन्हें ये तो समझ में आना चाहिए था कि वो जो कर रहे हैं वो गलत है।
धन्यवाद 🙏🙏
" गुॅंजन कमल " 💗💞💓

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