खुल गये कपाट बद्रीनाथ के,
कब खुलेंगे कपाट हृदय के?
कब खिड़़कियों के इस शहर में,
सबके दिल के गवाक्ष खुलेंगे?
है यह खिड़़कियों का शहर ही,
पर बंद पड़े मन की खिड़कियां।
कब खुलेंगे सबके अंतर की,
प्रेम की वे सब बंद खिड़कियां ?
कब घरों के उन खिड़़कियों से,
सुखद प्रेम की हवा बहेगी?
खिड़़कियों का शहर कब सबके,
खुशियों की खिड़की खोलेगी?
यह तन है देवालय हरि का,
रखना है इसे स्वच्छ सदा ही।
मन के सभी गवाक्ष खोलना,
करना सेवा दीन- दुखी की।।
खिड़कियां ये सदा खुला रहे ,
फैले प्रेम सब दिग- दिगंत में।
प्रेम की बयार चहुं ओर से,
पहुंचे खिड़कियों के शहर में ।।
जब खुल जायें सभी खिड़कियां,
सुख -समृद्धि का बहेगा दरिया।।
रामराज्य की जीवंत कल्पना,
खिड़़कियों का शहर तब होगा।

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