बात उन दिनों जब मैं रायपुर में रहती थी ।यहाँ की कोई भी जगह मुझसे अनजान नहीं थी।आज जब 25 साल बाद इस शहर में आयी हूँ तो हर जगह मुझसे अनजान है।
कितना कुछ बदल जाता है वक्त के साथ ।
"तभी" अचानक ट्रेन की सीटी की आवाज से ध्यान टूटा इस शहर में कुछ काम के सिलसिले में आयी थी ।स्टेशन से ऑटो ले के एक होटल की ओर चल दी ।दिन भर काम के कारण बाहर रहना पड़ा रात को होटल आयी खाना के सो गई दिनभर की थकान से जल्दी ही नींद आ गई सुबह ठंडी-ठंडी हवा से नींद खुल गयी।बिस्तर से उठ के खिड़की के पास ठंडी हवा का आनंद ले लेने लगी ।बाहर प्रक्रति का मनोरम दृश्य देखकर मन आंनद से भर गया ।
एक दिन का काम था इस शहर में आज वापस भी जाना है।जल्दी से अपना सामान उठायी और स्टेशन की ओर चल दी "करीब" आधे घंटे बाद गाड़ी आयी । मैं अपनी सीट पे बैठी कुछ ही देर में गाड़ी इस शहर को छोड़ आगे बढ़ने लगी मैं खिड़की से बाहर देखी और दिल यादों के समंदर में खो गया ।
"मुझे "याद है जब मैं इस शहर में पहली बार आयी थी । पापा का ट्रांसफर हुआ था मैं,माँ और मेरा छोटा भाई हमलोग बहुत खुश थे।हमलोग एक किराये के मकान में रहने लगे कुछ ही दिनों में मुहल्ले के सभी लोगों से हमारी जान पहचान हो गयी। मेरा एड्मिसन यहाँ के कॉलेज में हो गया तभी मैं 12वी में पढ़ रही थी छोटा भाई आर्यन का भी एक अच्छे स्कूल में दाखिला हो गया पापा अविनाश वर्मा बैंक में केशियर थे और माँ आशा वर्मा एक कुशल गृहणी थी।मुझे पढ़ाई में बहुत मन लगता पर घर के काम मे बिल्कुल मन नहीं लगता था ।कभी-कभी माँ बोलती अंजली घर के काम भी सीख लो ससुराल में नाक कटवाओगी ,तो पापा बोलते मैं बेटी के लिए 4 नोकर भेज दूँगा ससुराल में ....फिर मैं और पापा जोर से हँस परते थे।धीरे-धीरे समय बीतता गया। एक दिन मैं अपने छत पे शाम को घूम रही थी।माँ और पापा बाजार गए थे। आर्यन नीचे मैदान में अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था और मैं देख कर आनंद ले रही थी "तभी" अचानक आर्यन गेंद के पीछे दौड़ते हुए सड़क पर चला गया,आगे से एक गाड़ी आ रही थी मैं घबराती हुई नीचे आयी और सड़क की ओर दौड़ पड़ी तभी सामने से एक युवक आर्यन के साथ आता दिखा ।
क्रमशः
ऋचा कर्ण


0 टिप्पणियाँ