कड़वी यादों को दोहराया ही क्यों जाता हैं ,
मर चुके रिश्तों को जिलाने मे क्या जाता है।
माना की बेबाक हू मै अपनी जिन्दगी की उलझनों से,
मगर इक पल खुश रहने मे क्या जाता है।
खामोशी के घरोंदे से घर बनाती हैं खामोशियां,
खामोश क्यों हो बताने मे क्या जाता है।
कोई नही अपना कोई नहीं पराया,
मगर अपनो पर थोड़ा हक जताने में क्या जाता है।
गर हर तरफ़ उलझनों,खामोशी
नफरतो,का बाजार लगा है,
तो तुम्हे मोहब्बत के दो बोल
गुनगुनाने मे क्या जाता है।।

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