मनवा क्यों..? धीर धरत नंईयाँ,
मनवा रेऽऽ क्यों..? धीर धरत नंईयाँ,
मेरी प्रीत मिलन को तकती,
ये अंखियाँ थकत नंईयाँ,
का करुं सखी री....
बे तोऽऽ आ़वत नंईयाँ,
बीतत जात हैं, दिनों पे दिन,
जे रैन तो ऽऽ कटत नंईयाँ,
मनवा क्यों..? धीर धरत नंईयाँ,
मनवा रेऽऽ क्यों..? धीर धरत नंईयाँ,
का करुं सखी री....
होरी निकर गयी, रंग भरी,
जगमग दीवारी, सोई आ गयी,
कातक के जे दिना,
काटे कटत नंईयाँ,
मनवा क्यों..? धीर धरत नंईयाँ,
मनवा रेऽऽ क्यों..? धीर धरत नंईयाँ,
का करुं सखी री....
जे दिना तो, सत्तुर से लागें मोंखो ,
चेन मोखों पड़त नंईयाँ,
धरकत रहत, जो बैरन मनवा,
बे हमरे आवत नंईयाँ,
मनवा क्यों..? धीर धरत नंईयाँ,
मनवा रेऽऽ क्यों..? धीर धरत नंईयाँ,
का करुं सखी री....
मूरत रहत, जा मन के भीतर,
यादें उनकी बिसरत नंईयाँ,
पीरई पीर, भरी दिल भीतर,
मनवा जो भटकत है, मोरी गुइयाँ,
मनवा क्यों..? धीर धरत नंईयाँ,
मनवा रेऽऽ क्यों..? धीर धरत नंईयाँ,
का कहूँ सखी री....
जे मनवा तो, इततो बैरी है,
समझावें तो, समझत नंईयाँ,
सांझ ढरी, जे बेरन रतियाँ,
अंधियारी रजनी, बीतत नंईयाँ,
मनवा क्यों..? धीर धरत नंईयाँ,
मनवा रेऽऽ क्यों..? धीर धरत नंईयाँ ।
मनवा रे.....
काव्य रचना -रजनी कटारे
जबलपुर ( म.प्र.)

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