प्रशांत को बहुत अकेलापन लग रहा था । बोरियत दूर करने के लिए वह पार्क में घूमने चला आया । पार्क में कई बच्चे खेल रहे थे । तभी प्रशांत की नजर एक महिला पर गई, जो क्यारी साफ कर रही थी । वह कोई साठ- पैसंठ की उम्र की होगी । वह पार्क में काम करने वाली नहीं लग रही थी । प्रशांत महिला के पास गया और कहा -
"आपको यहां पहली बार देखा है ।"
उसने नजरे उठाई और कहा - "जी, मैं यहां पहली बार आई हूं" ।  "आप यहां काम करती हैं ?" प्रशांत ने पूछा ।
"अरे नहीं, मैं यहां काम नहीं करती । मैं तो टाइम पास करने के लिए क्यारी साफ करने लगी ।" उसने मुस्कुराते हुए कहा ।
प्रशांत ने पूछा - "क्या मैं आपकी मदद कर सकता हूं ?"
वह हंसने लगी और बोली- "जैसी आपकी मर्जी ।"
प्रशांत ने उसे अपना नाम बताया और कहा - "मैं यहां अक्सर
आता हूं , आज कुछ अच्छा महसूस नहीं हो रहा है । आपको
देखा तो अपने आप को रोक नहीं पाया । दरअसल मुझे बहुत
बातें करने की आदत है । हालांकि मैंने अभी अपने बेटे - बहू
और पोते से बात की है, फिर भी मन नहीं भरा इसलिए पार्क
चला आया ।"
वह महिला मुस्कुराई और बोली - "अब मुझे जाना होगा ।'
" क्यों, क्या हुआ ? मेरी बक - बक से आप परेशान हो गई ।"
वह हंसने लगी  - "अरे नहीं, दरअसल फिल्म खत्म होने का
समय हो गया, मेरी साथी लोग आती ही होंगी ।"
प्रशांत उस महिला के साथ- साथ चलने लगा, और पूछा -
"क्या मतलब"
"जी मैं एक वृद्धाश्रम में रहती हूं । आज वे लोग हमें सिनेमा
हॉल में फिल्म दिखाने लाए हैं। मुझे फिल्म देखना पसंद नहीं,
इसलिए मैं पार्क आ गई ।"
"क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं ?" प्रशांत ने झिझकते
हुए पूछा ।"
"मेरा नाम यशोदा है ।"
"क्या मैं आपसे मिलने वृद्धाश्रम आ सकता हूं ?"
"हां, वहां मिलने से कोई मना नहीं करता , पर आप मुझसे क्यों मिलेंगे ?"
"बस ऐसे ही, कभी मन किया तो आ सकता हूं न ?"
"जैसी आपकी मर्जी" यह कहकर यशोदा चली गई ।
प्रशांत को अब पहले से अच्छा लग रहा था । वह भी अपने घर की ओर चल दिया ।

एक दिन बाजार में प्रशांत की मुलाकात यशोदा से हो गई ।वह आश्रम के लिए कुछ सामान लेने आई थी । दोनों एक -
दूसरे को देखकर मुस्कुराए- " आप तो आश्रम आने वाले थे"
"हां मन तो कर रहा था पर मुझे लगा, कहीं आपको कोई परेशानी ना हो । वैसे उस दिन आपसे बात करके मेरा मन बिल्कुल ठीक हो गया था ।"
फिर प्रशांत ने पूछा - "आश्रम का सामान आप खरीदती हैं?
"नहीं, मुझे काम करना पसंद है इसलिए जो मैं कर सकती हूं,कर देती हूं । ये रामलाल है, वहां काम करता है । इसका 
हिसाब थोड़ा कमजोर है , इसलिए मैनेजर ने मुझे इसके साथ भेज दिया ।"
"ठीक है, तो मैं अाऊंगा किसी दिन आपके आश्रम में ।" यह कहकर प्रशांत ने यशोदा से विदा ली ।

एक दिन प्रशांत आश्रम पहुंचा । मैनेजर ने यशोदा को बुला भेजा । दोनों आश्रम के पार्क में ही बैठ गए ।
प्रशांत ने कहा - "मेरे आने से आपको कोई परेशानी तो नहीं हुई , यशोदा जी ।"
" नहीं नहीं , ऐसी कोई बात नहीं ।" फिर पूछा - "आपके घर में कौन- कौन है ?"
प्रशांत ने बताया - "मेरी पत्नी को दुनिया से गए दस साल हो गए । मेरे दो बेटे और एक बेटी है । तीनों की शादी हो गई ।
बेटी विदेश में रहती है , बड़ा बेटा मुंबई में और छोटा बेटा दिल्ली में रहता है । तीनों के दो दो बच्चे हैं । तीनों ही मुझे अपने पास बुलाते हैं कि हमारे साथ रहो । पर मैं नहीं जाता,
मेरा मन नहीं लगता । उन सब की बहुत बिज़ी लाइफ है ।
मैं उनके हिसाब से एडजस्ट नहीं हो पाता । और वो मेरे लिए एडजस्ट करे , मुझे अच्छा नहीं लगता । वे लोग मुझे रोज फोन करते हैं, कभी - कभी वीडियो कॉल भी करते हैं । बस मैं इसमें ही खुश हो जाता हूं । मैं जानता हूं कि वे सब मेरी फिक्र करते हैं । पर मैं अपने तरीके से जीना चाहता हूं , बस 
कभी कभी थोड़ा अकेलापन महसूस होता है ।
अरे, मैं तो बोलता ही जा रहा हूं, आप भी क्या सोचती होगी ।
आप बताइए अपने बारे में ।"
यशोदा ने उदासी से कहा -"आप भाग्यवान है जो आपको ऐसा परिवार मिला । सबको नहीं मिलता, मेरा एक ही बेटा है। जिसे बहुत ही लाड़ से पाला । मेरे पति के जाने के बाद मैं उसे बोझ लगने लगी । मैं घर का सारा काम खुशी से करती,. 
पर वे मुझसे नौकरानी जैसा बर्ताव करने लगे । हर रोज कोई न कोई इल्ज़ाम लगाया जाता । एक दिन मैंने वह घर ही छोड़ दिया । उन लोगों को बिना बताए यहां आ गई ।"

"क्या उन लोगों ने आपको ढूंढने की कोशिश नहीं की ।"

"मेरी सहेली सुषमा एक दिन मेरे घर गई थी मुझसे मिलने, मेरे बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि मैं हरिद्वार गई थी वहां मेरा पैर फिसला और मैं नदी में बह गई ।"
"ओ हो, वे तो बहुत ही बुरे हैं " प्रशांत ने दुखी होकर कहा ।
"उसने मुझे मरा समझ लिया तो मैंने भी उससे नाता तोड़ लिया । अब मैं यहां ठीक हूं । आज आप से बात करके मेरे दिल का बोझ हल्का हो गया ।" यशोदा ने कहा ।
दोनों ने एक - दूसरे से विदा ली और फिर मिलने का वादा किया ।

उस दिन मौसम सुहाना था । यशोदा आश्रम के पार्क में टहल रही थी । तभी दो युगल उसकी तरफ आए और उसे अभिवादन करते हुए कहा - "हम यशोदा जी से मिलना चाहते हैं ।" ये जानने पर की वो ही यशोदा है तो एक ने कहा -
"मेरा नाम प्रदीप है और ये मेरी पत्नी प्रेमा है । ये मेरा छोटा भाई संदीप है और ये इसकी पत्नी शीला है । हम प्रशांत जी के बेटे बहू हैं ।"
"क्या हुआ प्रशांत जी तो ठीक है न" यशोदा ने चिंतित होते हुए कहा ।
" जी वो ठीक हैं , हम एक सप्ताह कि छुट्टी लेकर कल ही आएं हैं । वे फोन पर भी आपके बारे में बात करते हैं। आपसे मिलने के बाद पापा की सेहत बहुत अच्छी हो गई है ।
उनकी बातों से लगता है, वो आपको पसंद करते हैं ।"
अब प्रेमा ने कहा -"हम सब आपकी और पापाजी की शादी 
करना चाहते हैं , यदि आपको एतराज न हो तो ।"

यशोदा आश्चर्य से सब सुन रही थी फिर बोली -
"ये कैसी बातें कर रहे हो बच्चों, इस उम्र में ऐसा कैसे हो सकता है ? लोग क्या कहेंगे ?"
संदीप ने कहा - " आप लोगों की बात छोड़ो, अपनी बात बताओ । हम आपके बहुत अच्छे बेटे बहु बनेंगे ।"
यह कहकर सब हंसने लगे जिसमें यशोदा भी शामिल है ।