ठाकुर भानुसिंह के तीन बेटों जोरावर सिंह, नबाब सिंह और फौलाद सिंह में फौलाद सिंह बचपन में ही पोलियो ग्रस्त हो गया। गांव के माहौल में उसका जितना उपचार हो सकता था, वह हुआ। पर कमर के नीचे पैरों ने अपनी जान खोई तो फिर वह कभी खड़ा न हो पाया।

    कुछ दिनों तक तो ठाकुर साहब ने बेटे की चिंता की। किसी वैद्य से दवा भी लेकर आये। पर जब फौलाद पर कोई फर्क न पड़ा तो उसकी तरफ से उदासीन होने लगे। यही संसार की रीति है। ठाकुर साहब का प्रेम दोनों बड़े बेटों को मिलता रहा और छोटा फौलाद जो घिसट घिसट कर जैसे तैसे चल पाता, ने खुद को इस हिसाब से ढाल लिया। भले ही वह चल नहीं पाता पर उसे किसी से सहारा लेना मंजूर न था। समझ चुका था कि कोई यों ही सहारा नहीं देता है। बदले में कुछ न कुछ जरूर चाहता है। फौलाद को लगता कि वह किसी को बदले में कुछ देने की स्थिति में नहीं है। वैसे ठाकुर साहब हजारों हैक्टेयर भूमि के मालिक थे। पर फौलाद जानता था कि वह हमेशा अपने भाइयों पर आश्रित रहेगा। अनेकों बार नकरात्मक बातें मनुष्य को सार्थक दिशा दे देती हैं। फौलाद भी अपने नित्य कर्मों के लिये किसी पर आश्रित न था। विद्यालय पढने नहीं गया। फिर भी फौलाद का ज्ञान अपने भाइयों से अधिक था। बांसुरी बजाने में वह निपुण था। वास्तव में बांसुरी से फौलाद अपने मन की पीड़ा भुला देता था। 

   जोरावर सिंह और नबाब सिंह की शादी हो गयी। दोनों की पत्नियां बड़े ठाकुरों की पुत्रियां थीं। जोरावर की पत्नी दामिनी तो विधायक जी के खास रिश्तेदार की बेटी थी। इस संबंध से ठाकुर भानुसिंह को राजनैतिक लाभ ही था। नबाब सिंह की पत्नी केवल नाम की सुरुचि थी। वास्तव में फूहड़ता का साक्षात रूप थी। वह भी धनी पिता की पुत्री थी।उसके पिता अनेकों फैक्ट्रियों के मालिक थे। 

   घर में बाहर के काम के लिये तो नौकर थे। साफ सफाई का काम भी एक औरत कर जाती। बस केवल खाना बनाने का काम बचा। उसमें भी दोनों औरतों की जान निकलती थी। अक्सर दोनों की लडाई की आवाजें बाहर बैठक में बैठे ठाकुर भानुसिंह तक पहुंचती। 

   ठाकुर भानुसिंह अपने दोनों बड़े बेटों के साथ खलिहान पर थे। आज गेंहूं की कटाई चल रही थी। वैसे काम करने के लिये बीसियों मजदूर थे। पर देखभाल तो करनी होती है। सुबह सुबह तीनों थोड़ा कलेऊ खाकर निकले थे। भगवान सूर्य सर तक आ चुके थे। 

   " दातादीन। जरा हवेली तक जाकर वहाँ से खाना ले आना।" 

  दातादीन जो वास्तव में ठाकुर साहब के घर का नौकर था तथा उसका प्रयोग समयानुसार खेतों में और दूसरे कामों में भी लिया जाता था, ठाकुर साहब के घर के हालात अच्छी तरह जानता था। इस बात का कोई भरोसा नहीं कि हवेली में आज खाना बना भी हो। आदमियों के बाहर जाते ही दोनों ठकुराइन वाकयुद्ध में ऐसी व्यस्त हों कि भोजन जैसी समस्या पर उनका ध्यान ही नहीं गया हो। वैसे इस स्थिति का सबसे ज्यादा फायदा वही उठाता था। कई बार घंटों हवेली के बाहर रखी बैंच पर आराम करने को मिल जाता। 

   पर दातादीन ने आज जैसी स्थिति पहले कभी नहीं देखी थी। एक स्त्री खुद के खिलाफ सहन कर सकती है पर अपने मायके बालों के खिलाफ कुछ नहीं। उसमें भी जब स्त्री का मायका उनके ससुराल से बढ़कर ही हो तो फिर क्या दबना। 

   आज दोनों स्त्रियों के मध्य बहस के दौरान एक दूसरे के मायके बालों पर कीचड़ उछालना शुरु हो गया था। 

  " माॅ बाप ने बस बेटी का नाम सुरुचि रखकर अपने कर्तव्यों से इति श्री कर ली। अरे नाम रखने से कोई सुरुचि नही हो जाता। कुछ संस्कार तो दिये नहीं है बेटी में। न काम धाम का सहूर और न बड़ों से बात करने की तमीज।" 

   वैसे सुरुचि शायद जिठानी की फटकार सुन लेती। पर इस तरह विवाद के मध्य उसका अपने माता पिता को लाना अच्छा नहीं लगा। 

" अपनी हद में रहो जीजी। मैं कोई घर की नौकरानी नहीं हूं। बड़े पिता की बेटी हूं। मुझे घर के काम करने की क्या जरूरत। यह तो आप जैसी छोटे माॅ बाप की बेटियों को आता है।" 

   " खबरदार सुरुचि। मेरे माॅ बाप के बारे में कुछ बोला तो। तेरी जबान काट लूंगी। मेरे माॅ बाप भी कोई गये गुजरे नहीं हैं। बहुत बड़े आदमी हैं। बड़े घर की बेटियां संस्कारों में भी बड़ी होती हैं। सच बात तो यह है किसी लड़की के संस्कार ही उसके मायके का बढप्पन दिखाते हैं। मेने कौन सा अपने मायके में खाना बनाया। पर ससुराल में आते ही पूरी घर की जिम्मेदारी सम्हाल ली। कोई दिन ऐसा नहीं जाता कि घर पर आठ दस बाहर के लोग न आये हों। पर कभी भी कोई भूखा नही गया। "

  वैसे दामिनी की बात सत्य थी। पर यह उन दिनों की बात थी जब घर में उसकी देवरानी नही आयी थी। देवरानी से प्रतिस्पर्धा में आज बाहर बालों की तो बात क्या, घर बालों के भूखे रहने की नौबत आ गयी। 

   दातादीन समझ गया कि आज पहली बार उसे खाली हाथ लौटना होगा। खेत पर बाहर के मजदूर भी काम कर रहे हैं। सबको पता चल जायेगा। सामने तो शायद ही कोई कुछ कहे, पर पीछे जरूर बोलेंगे। भले ही दातादीन काम करने में कभी कभी बेईमानी कर लेता है, पर वह है मालिक का वफादार। गांव के बाहर ठेल लगाकर पूड़ी बेचने बाले से उसने पूडियां पैक करायी। और खेत की तरफ बढ लिया। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'