सच बोल रहा है तू, हाँ माँ  बिल्कुल सच,  अपूर्वा दी को बडे पापा ने बांध दिया है, वो बहुत रो रही है, मै वहाँ गया तो बडे पापा ने मुझे भगा दिया, अरे ऐसे कैसे, माँ आप बडे पापा को रोको, इतना बोल कर माँ के गले लिपट कर रो पडा आठ साल
का नवीन  ---प्रिय पाठको  ये अंश इसी  उपन्यास का है अखिर क्या हुआ होगा, नवीन की बहेन के साथ आगे जानने के लिए चलना होगा हमे पृष्ठभूमि ' पर """""""
चारो ओर से पहाडियों की गोद मे बसा एक छोटा सा शहर, 
रायगंज, आधुनिकता से लिपटा परिवेश, अधिकतर घर क्षत्रिय के  ऊंचे लोग ऊंची पंसद, उन्ही के बीच कुछ एक घर निम्न वर्ग के न वो गरीब न वो अमीर, बस अपनी मस्ती मे मस्त,, 
सभी जगह करोना महामारी का कहर ,,जो बच्चे शहर पढने गये थे वो अपने घर वापस आ गये थे! 
उन्ही मे पण्डित त्रिलोकी  पांडे का बेटा भी था! जो गाँव वापस आया  था! यही से शुरू होता है विधाता का सफर""""
अरे बबुआ उठ जाओ.शहर गये थे शिक्षा ग्रहण करने सारे संस्कार गवां आये, पण्डित त्रिलोकी  की पत्नी बेटे को उल्हना  देती हुई बोली, माँ सुबह सुबह ही कितना चीखती चिल्लाती हो, 
संतोष झल्ला कर बोला, बेटे की खीज से उदास सी हो गई, त्रिलोकी पांडे जी की पत्नी मधु  और चुपचाप बेटे को छोड़कर रसोई मे आकर बरतनों पर गुस्सा उतारने लगी'मधु जी का मन विचलित हो गया था, मन हो रहा था जाकर दो चार थप्पड़ रसीद करे, पर न कर सकी संतोष, इकलौता बेटा था, और अब युवा था! आजकल  बच्चे कैसे कैसे कदम उठा रहे है, सोच कर ही कांप गई मधू जी