नव वर्ष ने जब शुभ आगमन की
दस्तक दी थी,
चारों ओर खुशहाली
और हरियाली थी।
पर धीरे-धीरे कालचकृ ने
ऐसा चक्र चलाया कि,
मैने खुद को भी उसमें
फंस्ते भंवर में पाया।
देखे कई गुलों को गुलशन से
अलग्ते हुए,
कई बाग बागवाँ उजड़ते हुए,
सितारा टूटते हुए
गुल्दस्ता बिखड़ते हुए।
हे ईश्वर ये कैसा मंजर!
कहां गये वो हंसी कहकहे
वो बत्तखों का झुंड
वो हंसों के जोड़े,
वो रौनके बहार
वो खिल्खिलाता संसार,
वो फुल फुल्वारियां
वो पंछियों का कलरव,
जो करती थी
नई उर्जा का संचार।
रोशनी कि किरण,
जो भरती थी
जोश तन मन ।
काश ला सकूँ 
थोडी सी भी खुशियां,
खिले हुए चेहरे
वो बागे बहार,
जीवन संचार।
हम यथासंभव प्रयास करें,
वापस ला पायें गर खुशियां
उन चेहरों पर मुस्कान सजे।
ना हो कोई उदास गमगीन,
ना कोई बिछड़े अपनों से
ना हो अलग,
गुलशन रहे गुलजार सदा
बसा रहे घर संसार सभी का।
देश पर से संकट के बादल
छँट जायें,
हम चहुँ ओर खुशियां बिखेरे 
और निराशा के बादल दूर भगायें।

            ,,,,,,,,,डॉली मिश्रा "पल्लवि"
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