प्रकृति से प्रेम करो तुम,
देखो कितनी सुंदर प्रकृति।
 मनमोहन कितनी प्रकृति,
  सबके मन को सुख देती ।
  सुबह-सुबह रवि है आता ,
  अपनी सुंदर आभा फैलाता ।
  होले होले तुम्हें जगाता , 
  प्रकृति से प्रेम करो तुम।।
  पक्षी मधुर कलरव है करते ,
  अपने गान से मन मोह लेते।
   देखो वृक्ष कितने है सुंदर ,
   चारों ओर हरियाली होती ।
   जीवन के यह पालक हैं ,
   सबका पेट यह भरते हैं।
   भांति-भांति की औषधि देते ,
   बीमारियों को दूर है करते ।
    प्रकृति से प्रेम करो तुम।।
   ऊंचे विशाल पर्वत को देखो ,
   आच्छादित धरती गगन है करते।
    मानो अंबर से मिलते हैं ,
    उसका है आलिंगन करते।
    प्रकृति से प्रेम करो।।
   निकले इससे सुंदर नदिया,
    कल-कल करके बहतीरहती।
    हर जन कि वह प्यास बुझाती ,
    समुंद्र में जाकर वह मिल जाती ।।
    लहरे किलोल करती हैं ,
    प्रेम प्यार से वह मिलती है।
    प्रकृति से प्रेम करो तुम।।
    प्रकृति की बात कहूं क्या,
    चारों तरफ दृश्य मनोरम।
     मनभावन अति प्यारे प्यारे,
      प्रकृति से प्रेम करो तुम।।
      प्रकृति तुम्हें बहुत कुछ देती ,
      इसको भी कुछ दे लो तुम।
       अपने अपने अवतरण दिवस पर 
       एक एक वृक्ष लगा लो तुम
         प्रकृति से प्रेम करो तुम।।


                             दिल की कलम से
                             मधु अरोड़ा