बैठी थी छत की मुंडेर पर आसमाँ को देखकर तारे गिन रही थी,
अतीत के ख्यालों से पर भविष्य की सुनहरी कल्पना कर रही थी।
अचानक ही एक तेज हवा का झोंका आया,
जिसने बैचैन हुए मेरे मन में स्वरों का संगीत सुनाया।
सन्देशा लाया हो मानों प्रियतम का ये एहसास कराया,
छन-छन करती बूंदों की आवाज से सन्देशा सुनाया।
सुनकर सन्देशा उनका बावरी  सी मैं हो गयी,
तन-बदन सिहर उठा प्रेम रस पा के मैं तृप्त हो गयी।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"