मै अपने आप को इस भीड़ में
कुछ इस कदर खो देना चाहता हूं
कि मै खुद भी
अपने आप को ना पहचान सकूं!
क्योंकि मुझे नफ़रत है
इस झूठी शक्लो-सूरत से
किसी दिन
ऐसी ही तुम्हारी प्यारी सूरत पर
मै ख़ुद को लुटा चुका हूं!
मुझे क्या पता था -
जिसे मैंने
प्यार भरा बादल समझा
वो सिर्फ धुएँ का एक ढेर था
जो किसी के दिल की
आग तो क्या बुझाता,उल्टा उसे जलाता है!
जिसे मैंने
मीठे पानी का झरना समझा
वो तो तपता हुआ रेत था
जो किसी मुसाफिर की
प्यास तो क्या बुझाता,उल्टा उसे थकाता है!
मै अब तक
इसी मृग - मरीचीका में फंसा था
इसीलिए पग पग पर ठोकरें खाता रहा
तुम्हारी इस प्यारी सूरत को देखकर
मीठे झरने की कल्पना तो करता रहा
लेकिन यह ना समझ सका कि इस
मीठे झरने कि असलियत तो तपता हुआ रेत है!
जब से मैंने
इस असलियत को समझा है
मुझे हर मीठा झरना तपता हुआ रेत नजर आता है!
इसलिए
अब मै तुम्हारी तो क्या
खुद कि शक्ल से भी दूर भागना चाहता हूं
क्योंकि मुझे
अपनी शक्ल में भी तपता हुआ रेत नजर आता है!!
मौलिक एवं स्वरचित
सतीश निर्दोष
रेवाड़ी (हरियाणा )