अगर नहीं खलनायक होता,
तो क्या कहीं कथा कुछ होता?
कारण वही कथा का होता,
बिन उसके नायक नहिं होता।।
रावण अगर नहीं जो होता,
तो फिर रामायण क्या होता?
कौरव बिना महायुद्ध होता?
अस्तित्व महाभारत का होता?
रावण बिना राम क्या करते?
दुर्योधन बिना भीम क्या करे?
कर्ण बिना अर्जुन क्या कहलाते,
श्रेष्ठ धनुर्धर कभी इस जग में?
नायक हो या खलनायक हो,
बल औ' बुद्धि दोनों में होता।
नायक नहिं खोता विवेक को,
खलनायक विवेक को खोता।।
नायक देता संदेश जग को,
सत्य ,धर्म ,शांति और प्रेम का।
खलनायक संदेश देता हमको,
दुष्कर्मों का फल कैसा होता।।
रथ के दो पहिये सम दोनों,
नायक सा ही खलनायक भी।
खलनायक से द्वेष नहिं करो,
सीखो मर्म उससे जीवन की ।।
-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)
(मुखचित्र गूगल से साभार)

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