जबसे बड़े हुए 
पैरों पर है खड़े हुए
बचपन बीता 
आयी जवानी
बंधी पल्लू से 
एक दीवानी
कुछ दिन मौज
कमाना था रोज
आई बच्चों की फ़ौज
देती फरमाइस रोज
कभी माँ की बात
कभी भीतर की घात
चली देखो परीक्षा
सोचा लेलु में दीक्षा
 बाहर भी है सेवा
घर मे भी सेवा 
घर को जो सम्भाले
वो हस्ती बनाले
थोड़ा कुछ हथियाले
अब गृहस्थ कहला ले
संध्या पंवार