सिर धोकर मैं
अपने बालों को सुलझा नही पाती हूँ
आईने के आगे
खुद को सवांर नही पाती हूँ
बैठती हूँ
जैसे ही मैं
आईने के आगें
तभी आवाज ये सुनती हूँ
खाना बनने में कितनी देर हैं
छोड़ अपना सवरना
बालों को 
टॉवल में समेटती हूँ।
खाना खिला सबको
जब रसोई से निपटती
हूँ
लेती हूँ अपना खाना
घड़ी में दो बजे का
अलार्म सुनती हूँ
थक जाती हूँ
तब तक इतनी
सवरने की चाह छोड़ देती हूँ
टॉवल में लिपटे बालों को
उँगलियों से सुलझा
जुड़े में परिवर्तित करती हूँ
थोड़ी देर अपने
मनोरंजन के लिए
मोबाइल देखती हूँ
तभी कानों में
चाय की फरमाइश सुनती हूँ
तिस पर ये ताना
दिनभर मोबाइल में क्या करती हो
चाय के साथ ही
शाम के भोजन की तैयारी
में जुटती हूँ 
मेरी चाय को
एक घूँट में पी जाती हूँ
सबके पसंदीदा गाने
या फिल्में चलती हैं
ना मेरा कोई गाना है
ना ही कोई नाटक
इनके आने के समय
मैं रसोई में जुटती हूँ
सुबह से शाम तक
मैं कामों में रहती हूँ
आधे से ज्यादा दिन
अपनी टांगो पर खड़ी रहती हूँ
टाँगों के दर्द से जब में सो नही पाती हूँ
रोज का नाटक है ये ताना भी सुन जाती हूँ
बांध पैरों को चुन्नी से
दूसरे दिन फिर उठने के लिए सो जाती हूँ।
      मैं गृहणी


गरिमा राकेश गौत्तम
राजस्थान