"दोस्तों!!  जिंदगी के सफर का बचपन वो हिस्सा है जिसे न तो हम कभी भूल सकते है और न ही दुबारा से जी सकते है। बस अपने बचपन के उन लम्हों को सिर्फ याद कर सकते है। बचपन स्व जुड़ी कुछ झलकियां आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ"।।

जी चाहता है मैं फिर से बच्ची बन जाऊं,
बचपन की उन तमाम यादों को मुट्ठी में सहेज लाऊं।

कोलाहल से भरे इस शहर से दूर,
सुकून के कुछ पल बिताऊं।
पहली बारिस में निकली,
मिट्टी की वो सौंधी महक सूंघ आऊं।।

खेतों की पगडंडी पर चलकर,
वो सुबह का मुस्कराता सूरज देख आऊं।
सड़क पर चलती हुई भेद बकरियों संग,
खुशी के कुछ पल बिताऊं।।

बारिस में नाचती हुई मोर संग,
कदम से कदम मिलाऊं।
कुहू-कुहू करती हुई,
कोयल संग गीत गाऊं।।

कागज की नाव बना कर,
बारिस केपानी में तैराऊं।
छन-छन पड़ती हुई बूंदों संग,
छप-छप छपाक लगाऊं।।

बागों में जा चुपके से,
आम तोड़ लाऊं।
उस बूढ़े बरगद की जटाओं से,
झूला झूल आऊं।।

सहेलियों संग फिर से खेलूं छुपन-छुपाई,
सारी चिंताएं भूल जाऊं।
अपने चुलबुले पन से सबको हँसाऊं,
और खुद भी बेवाक हो खिलखिलाऊँ।।

खिड़की से आती हुई,
वो चाँद की चांदनी को घण्टों निहारूँ।
छू लूँ अपने दिल का हर इक कोना,
और फिर से बच्ची बन जाऊं।।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"