तुम न जाने कहाँ हो!!
किस रूप में हो??
पर कहीं तो हो ~
शाश्वत... अमर आत्मा....
शरीर के बंधनों से मुक्त होकर
ब्रह्माण्ड में न जाने कहाँ अवलंबित है!!
पर किसी त्यौहार का आना...
तुम्हारी उपस्थिति मुखर कर जाती है....
त्योहारों की तुम्हारी तैयारी एक आहट दे जाती है..
तुम्हारे मन सा रंग बिखेर जाती है।
जीवन के प्रति उल्लास का ~
जितना है
उसमें कैसे मन को उमंग के धागों में पिरोकर
उल्लसित रह सकते...
इसका बोध करा जाती है।
मैंने देखा है तुम्हें......
ईश्वर के दिये हर पल का जश्न मनाते//
संचय के लिए कभी अधीर न होते//
कभी किसी से प्रतिस्पर्धा न करते//
जीवन के हर रंग को जीते//
हर व्रत और त्योहारों को अपनी हंसी से
रंगते//
तुम जहाँ हो...
वहीं रंग बिखेरना!!
खिलखिलाना!!
मन के उल्लास से...
हर तरंग को प्रकम्पित करना!!
खुशबू बन बिखरना!!
सदैव अपनी आहट से,,,
मेरे मन के बंद दरख़्त खोलना!!
डॉ पल्लवी कुमारी "पाम "

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