दातादीन की वफादारी की जितनी तारीफ की जाये, कम है। मालिक के काम के लिये वह कहाॅ कहाॅ नहीं भटका। आखिर उसकी तलाश एक लड़की पर पूरी हुई। उस लड़की की पवित्रता पर संदेह करने का कोई कारण न था। उसके एक नजदीकी रिश्तेदार ने उसे धोखे से ऐसे ही एक गैंग के हवाले कर दिया था। फिर कितने ही ऐजेंडों से बढते हुए यहाॅ आयी थी। वह भी जानती थी कि भारतीय समाज देवियों की पूजा जरूर करता है पर देवी स्वरूप स्त्रियों पर विश्वास नहीं करता है। उसके दिमाग में बार बार यही बात डाली गयी थी अब उसके माता पिता भी उसे स्वीकार नहीं करेंगें। फिर जीवन तो काटना ही है। किसी वैश्यालय में जीवन बिताने से उसे यह बेहतर लगा।

  लड़की का नाम सत्यवती बताया। पर उसे सत्तो कहकर ही पुकारते थे। उम्र बस बीस साल, रंग एकदम गोरा। नैन नक्श सब उसी तरह जिसे सुंदरता का मापदंड कहते हैं। लगता है कि विधाता ने लड़की के रूप को बनाने में बहुत मेहनत की, पर उसका भाग्य बनाने में भूल कर दी। कुछ महीनों पूर्व ही अपने माता-पिता की दुलारी लड़की किसी अन्य के पाप का दंड भोग रही थी।

  फौलाद सिंह की हालत तो उस बिल्ली की भांति थी जो दूर से छीके को ताक रही थी कि अचानक छींका गिर गया। कहाॅ उसकी शादी के भी लाले थे और कहाॅ उसे इतनी सुंदर दुल्हन मिल गयी। 

   दामिनी और सुरुचि ने सत्तो को घर का काम करने बाली नौकरानी से बढकर नहीं माना। अब दोनों बड़ी बहुओं में दोस्ती थी। झगड़े की जो बजह थी, वह समाप्त हो गयी। इस समय मिल कर चलने से फायदा है। छोटी पर दबाब बना रहेगा। छोटे लोगों को हमेशा दबाकर ही रखना चाहिये। 

   न तो दामिनी और न सुरुचि को सत्तो का अतीत पता था। कभी उसके पिता उसे तलाशते हुए आ सकते हैं, ऐसी कल्पना का भी कोई आधार नहीं था। उसके बाद आपस में लड़ते हुए कुछ आदत ऐसी बन गयी थी कि जब तक किसी पर गुस्सा न निकाला जाये, उनका खाना भी नहीं पचता था। तो उनके क्रोध को सहन करने का पात्र अब सत्तो बन गयी। इसमें घर में किसी को भी आपत्ति न थी। सिवाय फौलाद सिंह के। 

  पर ऐसा बिल्कुल नहीं था कि फौलाद सिंह को सत्तो से कोई प्रेम था। सचमुच तो उसके मन में सत्तो के लिये अच्छे विचार भी न थे। वह तो इस तरह शादी करने के पक्ष में भी न था। उसकी नजर में दातादीन ने घर के हालात देखकर बाबूजी को बेबकूफ बनाया है। खुद अपना मतलब हल किया है। 

   इस विषय में फोलाद सिंह की राय आंशिक सत्य थी। इस व्यापार में दातादीन ने भी आर्थिक लाभ अर्जित किया। पर अपनी तरफ से उसने मालिक को और कोई धोखा नहीं दिया। पर फौलाद सिंह भी एक पुरुष ही था। पुरुष जो कि एक स्त्री की पवित्रता को कभी भी स्वीकार नहीं करता। फिर सत्तो तो कितने ऐजेडों के बाद उसके पास आयी है। उसके शुद्ध होने का प्रश्न ही नहीं होता। 

  सत्तो की पवित्रता के विषय में उसकी राय एकदम दृढ थी। उसने अभी तक सत्तो को पत्नी का दर्जा भी नहीं दिया था। पर घर की नौकरानी पर भी बेबजह हाथ उठाना, उसे मारना पीटना भी कहाॅ तक सही है। अब उसकी जिंदगी भी तो हवेली में ही कटनी है। तो उसके साथ मनुष्यों जैसा व्यवहार करना चाहिये। 

   सत्तो फौलाद सिंह के समर्थन को उसका प्रेम समझती थी। वैसे भी उसके मन में फौलाद सिंह के प्रति पहली नजर में ही दया आ गयी। खुद के लिये तो सभी जीते हैं। यदि मेरा जीवन किसी के काम आ जाये तो यही बड़ी बात होगी। 

  पुरुष और स्त्री में यही स्वाभाविक अंतर है। स्त्री प्रायः वहां से सोचना शुरू करती है, जहाँ पुरुष सोचना बंद कर देते हैं। बहुत बार यह सोचना गलत भी होता है। सबसे ज्यादा पीड़ा दायक पल वह होता है, जब स्त्री को पता चलता है कि वह जो सोच रही थी, वह गलत है। 

   फौलाद सिंह का बार बार दुहरा चरित्र सत्तो के मन को परेशान करने लगा। आखिर उसे सत्य पता चल ही गया। क्यों उसके जबरदस्ती के पति उनसे उखड़े रहते हैं। 

  " ठाकुर साहब। आप के विचार मेरे विषय में ऐसे कैसे।" सत्तो समझ नहीं पायी कि किस तरह कहे। 

  " मेरे ही नहीं, किसी के भी विचार यही होंगें। मेने तो तुम्हें मजबूरी में स्वीकार किया है। पर तुम्हें पत्नी नहीं मान सकता। यह सत्य है।" 

  " फिर मेरे पक्ष में आपका अपनी भाभियों से झगड़ा करना। यह सब क्या था। "

" आखिर मनुष्य हूं। कुछ तो मनुष्यता है मुझमें।" 

   सत्तो समझ गयी कि फौलाद सिंह वास्तव में एक पुरुष ही हैं। हालांकि उनके भीतर मनुष्यता है। 

" ठीक है। मैं सब समझ गयी। आपको अपनी पविंत्रता का मैं कोई प्रमाण नहीं दूंगी। मैं स्त्री हूं। पुरुष भला कब स्त्री के प्रमाणों से संतुष्ट हुआ है। फिर भी हमारे और आपके मध्य एक संबंध बन सकता है। मनुष्यता का संबंध।" 

  फोलाद सिंह शांत रहा। वह सचमुच सत्तो की बात का मर्म नहीं समझ पाया। अचानक उसके मन में सबसे बड़ी मनुष्यता उत्पन्न हुई। जो शायद उसके लिये उचित न थी। 

" देखो। मैं तुम्हारी पीड़ा समझ सकता हूँ। आप अपने माता पिता का नम्बर बताओ। मैं उन्हें बुलाऊंगा। "

". नही ।अब कौन माता पिता। कौन संबंधी। क्या पुराना जीवन। कौन अपनाएगा मुझे। कोई भी तो नहीं। आखिर दोष क्या है मेरा। यही कि मैं एक स्त्री हूं। पुरुष मानवता का दंभ भरते हैं। मैं स्त्री होकर मानवता का मार्ग दिखाऊंगी। "

  फौलाद समझ नहीं पाया। बस इतना समझा कि वह पुराने जीवन में वापस नहीं जाना चाहती है। 

   अभी तक सभी के जुल्म सहन करती आयी सत्तो के तेवर अब गर्म थे। पर अपनी निजी बात के लिये नहीं बल्कि फौलाद सिंह के लिये। भले ही दोनों के मध्य कोई खास रिश्ता न था पर इसकी खबर किसी को न थी। 

    यह भी क्या बात है कि सभी की जरूरतें पूरी होती हैं। पर मेरे पति की विशेष जरूरतों का कोई ध्यान ही नहीं। उन्हें चलने में परेशानी है। फिर भी उनके लिये कोई व्हील चैयर नहीं। शौचालय की व्यवस्था भी उनके अनुसार होनी चाहिये। इन छोटी छोटी बातों को कभी देखा ही नहीं गया। 

  आखिर सत्तो की कोशिशों से फौलाद सिंह की जरूरतें पूरी हुईं। चारों तरफ सत्तो के पति प्रेम की चर्चा थी। सत्तो फौलाद सिंह का कितना ध्यान रखती है। वास्तव में छोटी बहू बहुत अच्छी है। पूरा घर सम्हाल रही है। खुद के लिये कभी कुछ नहीं मांगा। पर पति की हर जरूरत का ध्यान रखती है। 

  पर सत्य किसी को न पता था कि सत्तो वास्तव में फौलाद सिंह की मानवता का बदला चुका रही थी। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'