बैठी हूँ बालकनी में .......
यूँ ही चुपचाप अकेले .......
अधरों पर मेरे एक .......
मीठी मुस्कान खेले ........
मैं देखूं आकाश को .........
सूर्य के प्रकाश को .........
अनायास ही मन क्षितिज पर .....
शब्द रूपी मेघ छा गए .......
शब्द इतने मनमोहक थे ........
मेरे मन को भा गये ..…...
कुछ कही - अनकही यादे ........
मेरे मन को गुदगुदाए .........
शब्दो में वो कशिश होती हैं .......
जो किसी का भी मन हर्षा जाए ..
विरह की कठिन  बेला भी .........
पिया मिलन में बदल जायें ........
दूरियां हो दरमियां जितनी चाहें ...
यादों का एक झरोखा आये .......
सारी दूरियां मिट जायें ........

           ..........@  नेहा धामा " विजेता "