हर रोज इक नई चुनौती से होकर गुजरती हूँ
कभी वास्तविक तो कभी काल्पनिक,
कभी अपनों से तो कभी स्वयं के अंतर्मन से,
हर दिन जिंदगी से एक जंग लड़ती हूँ।
जानती हूँ कि चुनौती जीवन का अभिन्न अंग है,
कभी प्रेम तो कभी विरह का प्रसंग है।
कई बार अंतर्मन के चक्रव्यूह से
खुद को बाहर निकाल लेती हूँ,
लेकिन जब बात अपनों की आती है,
तो फिर चुनौती जीत कर भी हार जाती हूँ।
रावण को मारकर सात समंदर पार से
राघव सीता को लाये थे,
लेकिन बात जब अपनों की आयी
तो स्वयं की प्रजा से ही हारे थे।
जीतना चाहते हो अगर सही मायने में,
तो स्वयं के अंदर पनपती हुई बुराई को जीतो।
बाहरी चुनौतियों को छोड़कर,
खुद की चुनौती का सामना कर उसे जीतो।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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