कड़वा है पर इसमें जमाने की सच्चाई झलकती है,
क्या करूँ ये कलम है साहिब जो सच लिखने को मजबूर करती है।
पेड़ों को काट कर ऑक्सीजन चाहते हो,
गंगा को प्रदूषित कर पानी स्वच्छ पीना चाहते हो।
समाज में असंतुलन फैला कर
सुकून की नींद सोना चाहते हो,
गरीबों के सपनों को कुचल कर
अपने बच्चों का आशियाना बनाना चाहते हो।
गर्लफ्रैंड का शौक रखते हो,
और पत्नी सती सावित्री चाहते हो,
दूसरों की बहिन बेटी पर बुरी नज़र रखते हो,
और खुद की बहिन को पाक रखना चाहते हो।
पत्नी के गर्भ में कन्या भ्रूण की हत्या कर,
नवरात्रि में कन्या भोज करवाना चाहते हो।
माता-पिता को बृद्धाश्रम भेज कर,
पितरों का आशीर्वाद चाहते हो।
जीते जी माँ-बाप को रुलाने वाले,
भीष्म की तरह अक्षय मृत्यु का बरदान चाहते हो।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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