बहुत मुश्किल से आती है,ये दो जून की रोटी।
क्या क्या खेल दिखाती है,ये दो जून की रोटी।।
गरीब से पूछो क्या होती है,दो जून की रोटी।
कड़ी मेहनत से मिलती है, उन्हें दो जून की रोटी।।
पिता दिन रात पसीने बहाता है,बहुत जुल्म ढाती है ये दो जून की रोटी।
तब जाकर औलाद खाती है, दो जून की रोटी।।
कभी कभी खून के आंसू रुलाती है,दो जून की रोटी।
कभी दूसरों के आगे हाथ फैलाती है,दो जून की रोटी।।
जब गरीबी में भी प्रेम और खुशी से मिलती है,दो जून की रोटी।
तो प्रीत मुस्कुराती है,यहां दो जून की रोटी।।
हरप्रीत कौर
शाहदरा, दिल्ली

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