कपड़ो में तह लगाना सीखते गए...
रिश्तों का तह लगाना भूलते गए//

हम अनपढ़ से आधुनिक होते गए ~

बाहर की ठाट -बाट सजाते गए....
अंदर से खोखले होते गए //

हम विकासशील से विकसित बनते गए ~

काश कपड़ो की तरह रिश्तों को भी तह लगाने का सलीका सीखा होता....

रिश्तों की सिल्वट्न को सुलझाने का भी सलीका सीखा होता...

कपड़ो की तरह रिश्ते भी करीने से सजे होते ~
तन की तरह मन को भी संवारा होता //

दिखावे के लिए ही नहीं...
सच में जीने का सही सलीका सीखा होता //

                                      
✍  डॉ पल्लवी कुमारी"पाम "