कितनी भी उदासी छाई हो दिल में,
लेकिन चेहरे पर हमेशा मुस्कान लिए रहती है।
वो माँ ही होती है साहिब जो लाख मुसीबत आने पर भी
सब कुछ ठीक है ये मुस्करा कर कहती है।।
सच में स्त्रियां बहुत बड़ी अदाकार होती है,
हर अभिनय को बड़ी ही ईमानदारी से निभाती है।
कभी बनती है आदर्श गृहणी तो कभी,
माँ बनकर ममता की मूर्ति बन जाती है।।
अपने प्यार भर अभिनय से सबको रिझाती है,
दिल के किसी कोने में सिसकती हुई उदासी को छुपाती है।
कोई नही जानता पर्दे के पीछे की उस उदासी को,
दुनियां को वो सिर्फ अपना हँसता हुआ चेहरा ही दिखाती है।।
सब कुछ छोड़ आयी थी जिनकी खातिर,
उन्हें भी अक्सर चुप पातीं है।
वो उदासी उस वक्त न चाहते हुए भी चेहरे पर
झलक आती है,
जब हर फ़र्ज निभाते हुए भी वो पराई समझी जाती है।।
उदास हुए दिल में बार-बार एक ही सवाल आता है।
कि उस घर में भी पराई थी,
इस घर में भी पराई हूँ,
आखिर ऐसा कौन सा घर है जो अपना कहा जाता है।।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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