जन्म-मृत्यु
दुनियां के दो अटल सत्य है,
इक जीवन और दूज मृत्यु है।
जन्म-मृत्यु के बीच में देखो झूल रही जिंदगानी,
सूत्रधार वो ईस्वर है कठपुतली उसका प्राणी।
करती सफर ये जिंदगी दिखलाती अनेकों रंग है,
हर कदम पर साया मृत्यु का चलती सदा वह संग है।
धूप और हो छाया जैसे दोनों का गहरा नाता है,
कोई न जाने इस जगत में कौन कब कैसे आता जाता है।
सतरंगी सी दुनिया में जिंदगी का सफर सुहाना है,
आती है जब मृत्यु किसी की तो लेकर कोई बहाना है।
पल भर का ये मेला है नही किसी का यहां ठिकाना है,
जन्म-मृत्यु का सत्य रामकृष्ण,गौतम,महावीर ने जाना है।
जिंदगी और मौत दोनों का ही इक दूजे में अस्तित्व है,
है मृत्यु तो ही जिंदगी है-है जिंदगी तो ही मृत्यु है।
जिंदगी की रेल में जो भी फ़साने है,
साथ चल दी मृत्यु के वो छोड़ चली सब तराने है।।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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