क्या क्या रंग दिखाती है यह भूख
 पल पल तड़पाती है हजारों को यह भूख।

 नन्हे हाथों में जब नहीं पहुंच पाती है रोटी ,
उन्हीं हाथों से भीख मंगवाती है यह भूख ।

औलाद को देखती है तरसते हुए जब एक मां ,
देह का व्यापार भी करवाती है यह भूख ।

एक बेबस बाप रात दिन पसीना बहाता है,
 पर फिर भी नहीं कई बार मिट पाती है यह भूख।

न जाया करो अन्न का एक दाना भी `सीमा `
एक दाने को कितनी आंखें तरसाती है यह भूख।