तुम कोमल थी....
तन से... मन से....
और वचन से......
अहले सुबह किसी ओस की बूंदों सी पारदर्शी ~
गिरिजाघरों में किसी पादरी के हाथों की बाईबिल सी ~
पावन थी बहती नदी की धार सी....
जिसके दोनों किनारे पर कचरे इक्क्ठे हो जाते हैं ;
निर्मल धार को बीच में छोड़.....
 अनवरत बहने को....
 और बहाने को.....
 फिक्र...अपनत्व...अपमान.... और..... प्यार।

                      तुम भी बहती रही....
                       और बहाती गयी....

 स्नेह..... गुड़ सी मिठास..... और आशीर्वाद।

नन्हीं उर्मियों सी तरंगित हैं तुम्हारे बाद भी-------
तुम्हारे मृदुल उदगार ~
मीठी....ठंढी.... दिन भर की थकावट को दूर करती हुई~  ज्यों कोई कलकल बहती नदी की धार!!!🌹🌹
                                        
   -डॉ  पल्लवी कुमारी"पाम "