इंद्रधनुष सम मेरा जीवन,
रंग बदलता देखो क्षण-क्षण।
लाल रंग उत्साह है मन में,
हर पल कुछ करने की चाह है मन में।
हरा रंग जीवन महकाता,
पीला रंग पुरुषार्थ बताता।
रंग गुलाबी जब मन भाये,
प्रेम का मधुर संगीत सुनाए।
विशालता व्यापकता समाई है नील रंग में,
ज्यों खरी उतरती गयी मैं हर अभिनय में।
सिखाता है अपनों के लिए त्याग करना केसरिया रंग,
छोड़ कर अपने सपनों को मैं तो रंग गयी पिया के रंग।
रंग श्वेत उज्ज्वलता और शुद्धता की पहिचान है,
शांति को देने वाला वो रंग बृद्धावस्था की शान है।
सारे रंगों को देखकर जब मन प्रसन्न हो जाता है,
तो मौसम बसन्त का फिर जीवन को बसंती बनाता है।
इन रंगों से सजकर मन इंद्रधनुष  बन जाता है,
बन कर काली कोयलिया फिर कुहू कुहू का गीत गाता है।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"