सद्विचार अक्सर प्रशस्ति का मार्ग खोलते हैं। वैसे तो दामिनी और सुरुचि दोनों ही सत्तो को छोटा मानती थीं। उस पर जुल्म करना अपना अधिकार समझती थीं। यह वास्तव में उनकी गलती नहीं थी। यह गलती थी उनके संस्कारों की। धनी पिता की पुत्रियाँ मानवीय गुणों से हीन थीं। पर जब ठाकुर भानुसिंह ने घर में सख्ती से बोल दिया कि आज के बाद किसी ने छोटी बहू को परेशान किया तो उसी दिन घर में रसोई बांट दूंगा। सब अपना बनाओ, अपना खाओ। तो दोनों घबरा गयीं। ऐसी स्थिति में समझदारी नम्र बनने में ही है। जब छोटी बिना कहे सब अच्छी तरह कर रही है तो बेबजह उसपर हुक्म चलाना भी कोई समझदारी नहीं है।
वैसे दामिनी की शादी को पांच साल हो चुके थे। सुरुचि के विवाह को भी तीन साल होने बाले थे। पर अभी तक दोनों की गोद सूनी थीं। दामिनी को तो अनेकों डाक्टरों को भी दिखाया गया। उपवास, पूजा, पाठ सब हुआ। पर जब ईश्वर ही नाराज हों तो फिर क्या हो सकता है।
अभी तक सुरुचि पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। पर मन में यह बात आने लगी थी। पता नहीं कि ईश्वर की क्या नाराजगी है कि घर में किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी।
ब्रत और उपवास से ईश्वर खुश नहीं हुए। पर अब छोटी समझी जाने बाली देवरानी को दिखावे के लिये ही सही, बराबरी देने पर ईश्वर भी प्रसन्न हो गये। कुछ ही दिनों के अंतराल में दोनों बड़ी बहुओं के पेट से होने की पुष्टि हुई। कहने बाले तो यह भी कहने लगे कि यह तो छोटी बहू का प्रभाव है। इतने समय में कुछ नहीं हुआ और छोटी बहू के चरण हवेली में पड़े कि एक साथ दो दो खुशियां इंतजार कर रही हैं। हालांकि यह सब मात्र संयोग था।
पर खुशी के एक पल में एक और चिंता आ गयी। घर में कोई बड़ी समझदार स्त्री नहीं है। यदि ठकुरानी जानकीदेवी आज जिंदा होतीं तो ऐसी घड़ी में बहुओं का जरूर साथ देतीं। बहुएं भी तो अभी लडकियां ही हैं। उन्हें ऐसे हालातों की क्या जानकारी। सबसे छोटी सत्तो तो वास्तव में ही लड़की है। ठाकुर साहब के लिये यह बड़ी चिंता का विषय था। इस स्थिति में उनके समधी और समधिन ही उनकी मदद कर सकते हैं। आखिर उनकी खुद की बेटियों की बात है।
दोनों समधियों को खुशखबरी के साथ संदेशा भिजबाया। ऐसे हालात में उनसे प्रार्थना की गयी कि अपनी बच्चियों को अपने घर बुला लें। पर वास्तविकता यह है कि बड़े लोगों का सोचने का तरीका भी अलग होता है। एक सामान्य व्यक्ति ऐसी स्थिति में अपनी पुत्रियों की देखभाल को प्राथमिकता देगा। बड़े लोगों के लिये ये बातें गोढ हैं। हर संबंधों को धन से तोलते आये लोगों की मानवीयता अक्सर खत्म हो जाती है। दोनों की नजरों में ठाकुर भानुसिंह की बुद्धि छोटी है। तभी तो वह आगे नहीं बढ पाये। अरे हम भी कौन लड़कियों की देखभाल खुद करेंगें। यह काम तो नर्स कर लेती हैं। किसी नर्स को रख लें। इसमें हमें परेशान करने की क्या बात है।
हालांकि ऊपर की बातें किसी ने ठाकुर साहब से नहीं कहीं। पर दोनों के पास अनेकों बहाने थे। दामिनी की माता तो खुद अपनी देखभाल नहीं कर पा रही है। सुमति के घर से भी अनेकों तरह के ऐसे बहाने आ गये जिन्हें सही मानना हर किसी की मजबूरी होती है।
वैसे गांव में बहुएं अपने ससुर से बात नहीं करती हैं। उनसे पर्दा भी करती हैं। पर जिस दिन ठाकुर साहब ने सत्तो को बेटी कहा, सत्तो ने उन्हें ससुर के स्थान पर पिता ही मान लिया। हर समय तो नहीं पर जब ठाकुर साहब को चिंता में देखती तो उनसे बात करने लगती।
"पापा। आप कुछ परेशान हैं।"
"हाॅ बेटी। हमारे गांव में कोई नर्स नहीं है। अब तुम्हारी भाभियों को आराम की जरूरत है। ऐसे में उनकी देखभाल कौन करेगा। यही चिंता की बात है। और कुछ नहीं।"
"फिर पापा जी। आप बिलकुल चिंता मत करो। आपको कोई शिकायत नहीं मिलेगी।"
ठाकुर साहब का मन यह मानने को तैयार नहीं था कि जिस मामले में अक्सर अनुभवी स्त्रियों से गलती हो जाती है, उस जिम्मेदारी को यह लड़की निभा सकती है। पर जब तक किसी नर्स की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक तो काम चलाना ही है।
सत्तो ने घर तो सम्हाल ही रखा था। फौलाद सिंह की देखभाल करती ही थी। अब दोनों जिठानियों की जिम्मेदारी भी सम्हालने लगी। दोनों को क्या खिलाना है। किस तरह देखभाल करनी है। इसकी जानकारी उसे कैसे हुई। आश्चर्य जनक रूप से सत्तो से कोई गलती नहीं हुई।
पास के कस्बे की डाक्टर सविता भी सत्तो के ज्ञान पर आश्चर्य में पड़ जाती। अनेकों बार डाक्टर द्वारा बतायी दवा के न मिलने पर सत्तो उसका सस्बस्टिटूट ले आती। विभिन्न रिपोर्टों पर भी डाक्टर से चर्चा कर लेती। डाक्टर सविता जो कि ठाकुर साहब की जानकार थीं, की अनुभवी आंखें यह समझ गयीं कि सत्तो को मैडिकल फील्ड का अच्छा ज्ञान है। यह ऐसे ही संभव नहीं है।
आखिर वह दिन आ गया जब ठाकुर साहब के घर किलकारी गूंजेगी। दामिनी की डिलीवरी का समय था। पर खुशी के समय पर एक बदकिस्मती भी पीछा कर रही थी। डाक्टर सविता की मुख्य प्रशिक्षित एक नर्स आज आयी नहीं तथा दूसरी को आने में समय लग जायेगा। पर आपत्ति किसी का इंतज़ार नहीं कराती। इस समय किसी का इंतज़ार नहीं किया जा सकता है। मौजूद स्टाफ को लेकर डाक्टर सविता अपना कर्तव्य निभाएंगी।
तभी डाक्टर सविता ने अपने साथ सत्तो को देखा। बिना समझाये वह एक प्रशिक्षित नर्स की भांति मुंह और सर को बंद किये थी। हाथों पर ग्लब्स पहने हुए थी। डाक्टर को जिस समय जिस औजार की आवश्यकता लगी, सत्तो बिना बताये ही वह औजार उन्हें बढा देती। जैसे उसे सब पता है कि कब क्या प्रयोग में आना है। आपरेशन थियेटर में एक बच्चे की किलकारी गूंज उठी।
डाक्टर सविता सत्तो के हाथों को देख रही थी। किस तरह उसने नवजात शिशु के शरीर से खून व अन्य गंदगी साफ की, किस तरह उसका नाल अलग किया, किस तरह शिशु को कपड़े पहनाये, किस तरह उसका बजन किया, किस तरह उसकी नब्ज जांच की और अंत में किस तरह शिशु को एक साफ कपड़े में लपेटा। यह यों ही संभव नहीं। सत्तो निश्चित ही एक प्रशिक्षित नर्स है। इतना हुनर तो सभी नर्सों में भी नहीं होता।
ठाकुर भानुसिंह कमरे में इंतजार कर रहे थे। मन ही मन सोच रहे थे कि ऐसे समय में सत्तो कहाॅ चली गयी। उसका अभी यहीं होना ठीक था। तभी सत्तो नवजात शिशु को लेकर आ गयी।
"बधाई हो पापा जी। आप दादा बन गये। अपने पोते को गोद में लीजिये।"
ठाकुर साहब ने हाथ बढाया। पर सत्तो ने हाथ पीछे कर लिया।
" अरे। हमारा नेग तो दिया ही नहीं।"
एक पल को सत्तो भूल ही गयी कि वह कोई नर्स नहीं है जिसे नेग देना है। अगले ही पल यादकर झेंप गयी। और पोते को ठाकुर साहब की गोद में दे दिया। फिर वह दुबारा कही भाग गयी। अभी उसे जच्चा की भी सफाई करनी है। अपने कर्तव्य को वह बीच में नहीं छोड़ सकती।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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