जब कभी भी हम इस मोड़ से जाते हैं,
चलते हुए कदम थोड़ा सा ठिठक जाते हैं।
कितना भी बहलाये मन ,न चाहकर भी,
यह नयना बरस जाते हैं।
जीवन के सफर में, हर डगर में,
कुछ मोड़ यों आते कदम तो बड़ जाते,
पर रूह के साए वहीं ठहर के रह जाते हैं।
कुछ चन्द पल की मुलाकातें वहाँ पर बैठी हैं,
जब भी गुजरें उस मोड़ से,
कितने कहकहे कदमों में लिपट जाते हैं।
न पूछो हाल दिल का क्या होता है ,
उस पल,न तो वहाँ ठहरते ही बने,
न यह कदम आगे ही बड़ पाते हैं।
कहीं भी ले जाए चाहें जिन्दगी की जरूरतें,
पर हर मोड़पर उस मोड़ से,
मिलते जुलते मोड़ मिल जाते हैं।
कैसी बेबसी , पलकों में नमी,
होठों पर हंसी न पूछो ,
तन्हाई में क्यों अरमान सिसक जाते हैं।
मुद्दते हो गयीं वो राह छोड़े हुए,
पर आज भी उनकी मासूम तरन्नुम से ,
मन के पतझड़ महक जाते हैं।
सच बताना ए मेरे बिछड़े हुए,
जीवन के पहर,क्या उनको भी,
वो मोड़ इस तरह ही तड़पाते और रुलाते हैं।
हमसे देखे नही जाते,उस मोड़ के सूनेपन,
जब भी होता गुजरना उस मोड़ से
हौले से मुस्कुराके एक साज जगा आते हैं।
जब तक है जिंदगी, हर कदम ओ हमनशीं,
मेरे दिल के गुलिस्ता में, बनके कली,
वो अधखिले गुँचे मोहबतो के शोर मचाते हैं।
अंजु दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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