भाव ये है की जब भी कोई  परदेशी अपने घर साल या दो साल बाद जाता है तो वो अपनी जीवन संगिनी को ऐसे ही समझाता होगा

अगर कभी मेरी याद आए तो धीरे से मुस्कुरा लेना 
मै जब भी मिलने आऊं तो बहते अश्क़ छुपा लेना

मालूम है मुझको तुम मेरे इंतजार मे बैठी हो 
मालूम है मुझको तुम कितनी बेक़रार बैठी हो 
मेरी तस्वीर को अपने मन मंदिर  मे बसा लेना 
मगर मै जब भी मिलने आऊं तो बहते अश्क़ छुपा लेना

तुम अच्छे से खुद को इस तरह सजा लेना
सोलह श्रृंगार करके दुल्हन का भेष बना लेना 
लाल गुलाब के पुष्पों से मेरी राह बिछा देना 
मगर मै जब भी मिलने आऊं तो बहते अश्क़ छुपा लेना

मुझे याद आता है तुम्हारे हाँथ का बना खाना 
मुझे याद आता है तुम्हारा अपने हाँथ से मुझको खिलाना 
जो हो तुम्हे पसंद वो भोज तुम बना देना 
मगर मै जब भी मिलने आऊं तो बहते अश्क़ छुपा लेना

तुम मेरी जिंदगी मे बहार बनकर आई हो 
रिमझिम घटा सी फुहार बनकर छाई हो 
मेरे स्वागत मे अपने मन का दीप जला देना 
मगर मै जब भी मिलने आऊं तो बहते अश्क़ छुपा लेना
आपका मुकेश "लखनवी"