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ऐ नींद ,
तेरे आने के सफर में
यादों के बड़े पड़ाव आते हैं
कुछ ठोकरें होती हैं... डूबती निराशाओं सी
तो कुछ समतल राहें...जगती आशाओं सी
कई मोड़ आते हैं
आज के कार्यों के मोल सा
कई गालियां पार करती है तू
कल के कार्यों के भूगोल सा
कुछ पर्वत पार करती
बीती जिंदगी के चिंतन सी
कभी घाटी में उतरती
भूले बिसरे यादों में मनन सी
क्या छूटा क्या पाया सा
रास्तों में निहारती निहारती
कब आके तू मेरी पलकों को बंद कर देती हैं
कब मुझे अपने आगोश में ले लेती है
मुझे एहसास ही नहीं होता
एहसास ही नहीं होता...
ऐ नींद !
मैं भी तेरे साथ सफर तय करती हूं
हर मोड़ पे तेरे साथ होती हूं ।

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