किसी भी शिव मंदिर में नंदी की मूर्ति स्थापित न हो ये असंभव है।

नंदी को भक्ति और शक्ति का पर्याय माना जाता है।नंदी का मुख हमेशा शिव ही की तरफ रहता है ।

सनातन धर्म  में मान्यता है कि सबसे पहले नंदी के कान में अपनी इच्छा बताने से वह इच्छा  शिव जी तक अवश्य पहुंचती है,क्योंकि भोले भंडारी तो सदैव जगत कल्याण हेतु ध्यानमग्न ही रहते हैं।

नंदी  ही सभी भक्तों का संदेश शिव तक पहुंचाते हैं।

शिव पुराण के अनुसार नंदी का जन्म भगवान शिव की कृपा  के फलस्वरूप हुआ।


ऋषि शिलाद  शिव के अनन्य भक्त थे,उनका  अधिकतर समय  ध्यान ,पूजा ,वेदों के पठन पाठन में गुजरता ,इसी कारण उनका ध्यान गृहस्थ जीवन जीने की ओर गया ही नहीं।


वक्त कहां  रुकता है,बुढ़ापा निकट आ रहा था,अब उन्हें चिंता सताने लगी कि,मेरे बाद कौन होगा मेरा उतराधिकारी।
उन्होंने पुत्र की कामना हेतु  शिव आराधना शुरू की।
 और कुछ ही दिनों बाद  ऋषि शिलाद को शिव कृपा से खेत में एक बालक की प्राप्ति हुई।

ऋषि शिलाद ने बालक को शिक्षित किया ।
एक दिन ऋषि शिलाद के दो  ऋषिमित्र  वरुण और मित्र  पधारे ,नंदी ने उनकी खूब सेवा की ।
जाते वक्त उन्होंने ऋषि को दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया ,परंतु नंदी को कुछ नहीं कहा।
ऋषि के पूछने पर उन्होंने बताया कि ,नंदी अल्पायु है।यह सुन ऋषि बहुत चिंतित हुए।

बालक नंदी ने जब पिता से उनके दुख का कारण पूछा तो ,उन्होंने उसके अल्पायु होने की बात बताई।

नंदी ने आश्वासन दिया कि, पिताजी आप दुखी न हों,मैं शिव की आराधना कर अपने लिए आयु मांग लूंगा।

नंदी भुवन नदी की ओर चल पड़े ,वहां उन्होंने रेत से शिवलिंग बना पूजा ,अर्चन शुरू कर दी।नंदी की तपस्या से प्रसन्न हो महादेव प्रकट हुए,और वर मांगने को कहा।

कहते हैं ना साक्षात ईश्वर जिसके सम्मुख आ जाएं , उसकी सांसारिक कामनाएं  ,वासनाएं सब विलीन हो जाती हैं।

महादेव के मनमोहक  दर्शन होते  ही  नंदी के मुंह से निकला _प्रभु मैं आपका सानिध्य पाना चाहता हूं।में जन्म ,मरण के चक्रों से मुक्त होना चाहता हूं।

महादेव मुस्कुराए ,और उन्होंने नंदी को बेल का मुख देकर ,अपना प्रिय गण बना लिया।
कहते हैं ,महादेव की शक्तियां ,नंदी में भी बराबर रूप से विराजमान हैं।

भक्ति ,समर्पण,भोलेपन से ईश्वर को पाया जा सकता है।नंदी का चरित्र ,भी इस बात को  चरितार्थ करता है।