🙏आज 1मई(मजदूर दिवस)की आप सभी को शुभकामनाएं 🙏
मजदूर जो मजदूरी करके अपना पेट पालता है,और छोटी-मोटी मजदूरी से ही अपनी जीविका का निर्वहन करता है।
ऊंची-ऊंची इमारतों को बनाने वाले मजदूरों को एक टूटी-फूटी झोपड़ी ही नसीब होती है।कई बार ऐसा होता है।इनके मेहनताना का सही मूल्य भी इन्हें नही मिल पाता,और निजी सुविधाएं भी इन्हें मुहैया नहीं कराई जाती।कई इमारतें ,स्कूलो,अस्पताल,सड़को को अपनी मेहनत से बनाने वाले........ इन मजदूरों को सिर्फ और सिर्फ दो जून की रोटी ही नसीब हो पाती है।
सड़कों को बनाने वाले यही मजदूर कोरोना काल में,पैसों के अभाव में कितने किलोमीटर पैदल चलने पर मजबूर थे।यदि सुविधाएं भी मिल रही थी, तो उसमें भी पैसों की सौदेबाजी थी।कुछ मजदूर तो चलते चलते ही अपनी जान गवां बैठे।तो कुछ थककर रेल की पटरियो में ही बेसुध सो गए, जिन्हें मालूम ही ना था, कि कल की सुबह वे देख ही ना पाएंगे,न जाने कितने माताओं ने अपने घर के चिराग को खोया होगा।
श्रमिक संगठनो कि देश में कमी नहीं है।लेकिन क्या यह संगठन पूरी सुविधाएं इन श्रमिकों (मजदूरों) को उपलब्ध करा पाते हैं कि सिर्फ नाम के लिए ही यह संगठन निर्मित किए जाते हैं।
बड़े-बड़े नेताओं को अपने पद(कुर्सी) की चिंता होती है,उन्हें तो सिर्फ राजनीति करनी होती है। और उसका सीधा निशाना, यह मजदूर ही बनते हैं।मजदूर दिवस का सही अर्थ उस दिन निकलेगा,जब इन मजदूरों को अपना सही हक मिल पाएगा। पता नहीं कब हमारे देश की प्रणाली में सुधार होगा और यह राजनीति खेलने वाले नेताअपने रूदबे(पद)से परे होकर इन मजदूरों और किसानों के हित के बारे में सोचेंगे।
ऊंची-ऊंची इमारतें,बनाते यह मजदूर
अपनी जान,जोखिम में डालकर
लोगों को, सुविधाएं देते भरपूर
दो जून की रोटी,के लिए तरसते मजदूर
" मजदूरों को ,मजबूर ना बनाओ
जो हक है ,उनका उसे दिलाओ "
मनीषा भुआर्य ठाकुर (कर्नाटक)

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