नमः सुरसरिते, नमामि गंगे!
हे भवतारिणि , त्रिपथगामिनी।
अच्युतचरण तरंगिणी, हे गंगे!
मोक्षप्रदा सगरसुत तारिणी ।।
भगीरथ तुझे भू पर लाया,
सगरसुत मोक्ष दात्री माते।
अति पावन हुई थी यह धरा,
मोक्षप्रदायिनी हो तुम गंगे ।।
अच्युत के चरण से तुम निकली,
शिव के शीश पर तुम विराजी।
हिमवान के गोद में खेलती,
धरा के गोद में तुम पलती।।
आदिकाल से तुम वंदित हुई,
देव मुनि नर से पूजित हुई।
पापपुंज का प्रक्षालन करती ,
धन्य ! परम पावनी तुम माई।।
आज नर हो गया अति पापी,
बहुविध तुझे प्रदूषित करता।
दूषित मन वह विसर्जित करता,
वर्जित मल और विषपदार्थ का।।
हिमवानसुता तुम श्वेता थी,
धवलवर्ण कांतिमयी भासती।
आज हरितवर्णा तुम हो गई,
हम मनुज से तुम रुष्ट हो गई।।
जीवनदायिनी है माँ गंगा ,
स्वच्छ और पवित्र इसे रखना।
मातृ अंक को कलुषित जो किया,
विनाश निश्चित यह हमें समझना।।
क्षमा करो हमें माते गंगे!
मत रुष्ट हो तेरे संतान से।
सद्बुद्धि हमें दो माते गंगे!
नमामि गंगे त्वम् नमामि गंगे!
-पेरीसूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर "

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