"" हमारे नए घर के गृह प्रवेश के तत्काल बाद नियति ने हमारे पिता को हमसे छीन लिया ,आज पितृ दिवस के मौके पे उनके लिए मैंने कुछ पंक्तियां लिखने का प्रयास किया है...""
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ज्यों हमारा घर बना जाने गृहस्वामी गए कहां
गृहप्रवेश के साथ कैसा ये काल प्रबल हुआ
निजभवन सुख करने का जब दिन आया
सूर्य हमें अनाथ बना क्यूं अस्तचल हुआ
स्वप्न सदन में मां को अपनी अकेली देख
पापा आपकी बहुत याद आती है""""
घर को देखती हूं तो बहुत अधूरापन लगता है
बिन जनक के सूना ये घर आंगन लगता है
आपके लगाए सारे पौधे छोटे हैं " पापा
मां सींचती है पर कहां उसका मन लगता है
बढ़ते पौधों पे आते नव पल्लव देख
पापा आपकी बहुत याद आती है""""
घूमते रहते कोने कोने हम सब पागल दीवाने
हंसी ढूंढ रही अब यहां हंसने के बहाने
अभी मूंछों की लकीर भी नहीं उगी
वे छोटे भाई मेरे, चले आपका फ़र्ज़ निभाने
उनकी आंखो में गायब होता बचपन देख
पापा आपकी बहुत याद आती है""""
छोड़ गए जानकियों को यहां किसके भरोसे राम कौन ढूंढेगा उनके लिए और कहां कैसे
चाहे नाते - रिश्तेदार हों या वर - परिवार
समय की जलती चिता पे सब हाथ सेकें
दुल्हन बनने की ललक त्यागते बहन को देख
पापा आपकी बहुत याद आती है""""
"""""" स्वरचित व मौलिक
"""" कीर्ति रश्मि नन्द

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