तेरे संग बांधे हैं जो धागे 
वो मोह के नहीं हैं- 
कि खुद को तुझसे बांध कर मैंने 
तुझे आज़ाद किया है, 
तुझे नहीं बांधा है खुद से, 
मैं तो छोड़ बैठी हूँ तेरे हाथों में 
अपने जीवन की डोर, 
तू बहता दरिया सा बन जा, 
मैं बन कर लहर बह लूंगी संग संग;
मैं बन कर खुशबू घुल जाऊँगी तुझमें, 
तू बन जा हवा,
उड़ता जा चाहे आसमां से आगे!

हाँ, जो बांधे हैं तुझसे, मोह के नहीं 
प्रेम के हैं वो नाज़ुक से धागे, 
थामे है जिनको मेरे मन ने
अपने विश्वास की उंगलियों से
मैं तो हर बार झुक जाती हूँ, 
कि जानती हूँ, तू रब है इस दिल का
यही डोर खींच लाएगी तुझे मुझ तक
झुक जाएगा एक दिन तू भी 
मेरे अटूट प्रेम के आगे।

शालिनी अग्रवाल 
जालंधर