इस बदगुमान दुनियां में,
खूबसूरत होना गुनाह सा लगने लगा।
जो कल तक थे मुहाफिज ईमान के,
बात जब खुद को साबित करने की आयी अंजुम,
हर शख्स यहाँ बेजुबान सा लगने लगा।

सारी रौनके एक उनके न होने से थीं बेमानी,
उनकी आमद से  क्या कहें हाल  दिल का,
   सदियों से पड़ा  हुस्नेखण्डहर जवान लगने लगा।

उनकी रुखसती का आलम  लफ्जों में बयान कैसे करूँ,
समझ सको तो समझ लेना मेरे भावों की गहराई को,
रोशनी से जगमगाता  शहर अंजुम वियावान  सा लगने लगा

   पहनकर सफेद पोशाक कोई , सुर्ख रूह नही होता,
कपड़ो के रँग से कर्मो पर फर्क नही पड़ता,
रोते बच्चे को निवाला जो उसने दिया, मुझे वो साही ईमान लगने लगा।

मेरे तड़पते मन के भावो पर बहुत वाह वाही मिली,
समझके जज्बात मेरे जो उसने एक आह भरी,
सच कहती हूं अंजुम तपते सेहरा में वो मुझे अपने सर पर बागवान लगने लगा।

भरी महफ़िल में तो सबने साथ रहने की रस्में  निभाई,
पर जब यादों की वो तन्हां शाम गहराई,
मैं हूँ तेरे साथ जो उसने कहा, मुझे वो मुझे अपना भगवान लगने लगा।

जो कल तक थे साथी मेरे ऐशोआराम के,
मुफलिसी से जो पड़ा मेरा  वास्ता , 
उस हर एक साथी को मै अनजान सा लगने लगा।

  रौनके दौलतों से नही होती इंसानों से,
जब वो थे तो था यह छोटा सा घर भी जन्नत,
उनके जुदा होते ही घर मेरा संगमरमर  का मकान से लगने लगा।

न जाने कब बदलेगा वक्त जब आदमी आदमी होगा,
घिरा हर तरफ भीड़ से पर मन से वो तन्हां होगा ,
इतनी सुखसुविधाओं से लैस के होते हुए भी, 
आदमी परेशान लगने लगा।

अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।